तेहरान। Heavy taxes in Hormuz: अमेरिका के साथ हाल ही में हुए समझौते (MoU) के बाद ईरान ने दुनिया को चौंकाते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। ईरान ने ऐलान किया है कि वह रणनीतिक रूप से बेहद अहम ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से गुजरने वाले जहाजों से ‘मैरीटाइम ट्रांजिट फीस’ यानी एक तरह का समुद्री टैक्स वसूलेगा।
अमेरिका के साथ 60 दिनों की बातचीत की अवधि के बाद यानी यानी अगले दो महीने के भीतर यह टैक्स लागू कर दिया जाएगा। ‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला ऐसे समय में आया है जब गुरुवार को अमेरिका ने ईरान से अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा ली है। इससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक पर कमर्शियल जहाजों की आवाजाही दोबारा शुरू हो गई है।
ईरान ने इस समझौते को अमेरिका पर अपनी ‘ऐतिहासिक जीत’ करार दिया है। उसका दावा है कि यह जलमार्ग उसी के नियंत्रण में है। इसके साथ ही, ईरान ने यूरोपीय देशों के नेतृत्व वाले किसी भी नौसैनिक सुरक्षा मिशन का कड़ा विरोध किया है।
अमेरिका-ईरान के बीच हुई इस डील के बावजूद मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ है। इजरायली अखबार ‘येदिओथ अहरोनोथ’ के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी सुरक्षा जरूरतें रहेंगी, तब तक इजरायल दक्षिणी लेबनान में अपना ‘सुरक्षा जोन’ कायम रखेगा। उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने को इजरायल का सर्वोच्च लक्ष्य बताया।
वहीं, ईरान का तर्क है कि इस समझौते के तहत लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान होना चाहिए, जिसके लिए इजरायल को दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना पूरी तरह वापस बुलानी होगी। ईरान ने इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर डाल दी है।
दूसरी तरफ, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा है कि अमेरिका लेबनान, हिजबुल्लाह और इजरायल समेत सभी मोर्चों पर ‘पूर्ण युद्धविराम’ की उम्मीद कर रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने वॉशिंगटन के साथ इस समझौते को अपनी मंजूरी दे दी है। अपने पिता की हत्या के बाद मार्च में पद संभालने वाले मोजतबा इसके बाद से सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं। खबरों के मुताबिक, उन्होंने कहा कि ट्रंप ने ‘हताशा’ में इस डील को पक्का करने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया है।
इन तमाम कूटनीतिक कोशिशों के बीच जमीनी स्तर पर हिंसा नहीं रुकी है। गुरुवार को भी इजरायली ड्रोन हमलों और गोलाबारी की खबरें सामने आईं, तो वहीं हिजबुल्लाह ने कफर तेबनित इलाके में इजरायली सेना पर हमले की जिम्मेदारी ली है।
ट्रंप के बचाव में उतरे जेडी वेंस
इजरायल के भीतर इस समझौते की तीखी आलोचना हो रही है। ‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ के एक ओपिनियन पीस में कहा गया है कि ‘अमेरिकी राष्ट्रपति की कमजोरी’ के कारण अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ यह युद्ध हार गए हैं।
इन आलोचनाओं पर पलटवार करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने डोनाल्ड ट्रंप का बचाव किया। वेंस ने कहा, “इस वक्त पूरी दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप ही इकलौते ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं, जिनकी इजरायल के प्रति सहानुभूति है। अगर मैं इजरायली सरकार के कैबिनेट में होता, तो मैं दुनिया में बचे अपने इकलौते ताकतवर सहयोगी पर हमला नहीं कर रहा होता।”
स्विट्जरलैंड में होगी तकनीकी बातचीत
स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला औपचारिक हस्ताक्षर समारोह अब रद्द कर दिया गया है। हालांकि ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन पहले ही अंग्रेजी और फारसी में दस्तावेजों (MoU) पर दस्तखत कर चुके हैं।
समारोह रद्द होने का मतलब है कि मुख्य मध्यस्थ रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अब इस कार्यक्रम के लिए स्विट्जरलैंड नहीं जाएंगे। इसके बावजूद, 14 सूत्रीय ज्ञापन को लागू करने, ईरान के तेल निर्यात से प्रतिबंध हटाने और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापार बहाल करने को लेकर कतर के स्वामित्व वाले बर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में तकनीकी बातचीत जारी रहेगी।
टैक्स वसूली पर सऊदी अरब और यूएई भड़के
ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बघेर गालिबाफ ने जब जलमार्ग को ‘मैनेज’ करने के नाम पर भविष्य में टैक्स वसूलने की बात कही, तो सऊदी अरब ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने कहा कि संघर्ष से पहले यहां सब कुछ ठीक था और जहाज बिना किसी रोक-टोक के आ-जा रहे थे। उन्होंने कहा, “अब युद्ध के नतीजे के तौर पर हम पर कोई नई व्यवस्था क्यों थोपी जा रही है? यह मेरी समझ से परे है। हमें पुरानी व्यवस्था पर लौटना चाहिए।”
वहीं, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी इस नई परिस्थिति पर अपना रुख स्पष्ट किया है। यूएई के पॉलिसी प्लानिंग डायरेक्टर मुआद अलवारी ने कहा कि जंग के दौरान यूएई ने ईरान के कुछ सबसे बड़े हमले झेले हैं, जिनमें होटलों और नागरिक संपत्तियों को निशाना बनाया गया।
उन्होंने साफ किया कि इस युद्ध से इजरायल के साथ उनके रक्षा संबंध और मजबूत हुए हैं और ‘अब्राहम समझौते’ को लेकर उनकी प्रतिबद्धता बिल्कुल नहीं बदलेगी।

