जयपुर। राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) की सियासत में मंगलवार को उस वक्त सबसे बड़ा ‘सुप्रीम ड्रामा’ देखने को मिला, जब जयपुर स्थित आरसीए एकेडमी में चुनाव का मतदान और सुप्रीम कोर्ट की रोक का आदेश एक साथ सामने आए। जब एकेडमी के भीतर 38 मतदाता 6 पदों के लिए पर्चियां डालकर राजस्थान क्रिकेट की नई सरकार चुन रहे थे, ठीक उसी समय देश की सबसे बड़ी अदालत ने चुनाव परिणामों की घोषणा पर रोक लगा दी।
इस नए मोड़ के साथ ही अब आरसीए चुनाव महज एक मतदान बनकर रह गया है। जीत का जश्न मनाने और आधिकारिक ढोल-नगाड़ों की उम्मीद लगाए बैठे प्रत्याशियों के इरादों पर कानूनी अड़चन का पानी फिर गया है।
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश के बाद चुनाव अधिकारी मतदान की प्रक्रिया तो पूरी कराएंगे, लेकिन किसी भी विजयी उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया जाएगा। मतों की गणना के बाद सभी परिणाम एक सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रख दिए जाएंगे।
अब सर्वोच्च न्यायालय का अगला आदेश ही यह तय करेगा कि सीलबंद लिफाफे से किसकी किस्मत का सितारा चमकेगा और आरसीए की नई कार्यकारिणी की कमान किसे सौंपी जाएगी।
सुबह 11:30 बजे शुरू हुई वोटिंग में बृजकिशोर उपाध्याय पैनल और पूर्व केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के बेटे धनंजय सिंह गुट के बीच कड़ा मुकाबला देखा गया। अध्यक्ष पद के लिए धनंजय सिंह और दौसा जिला क्रिकेट संघ के सचिव बृजकिशोर उपाध्याय आमने-सामने हैं। कुल 6 प्रमुख पदों के लिए 11 उम्मीदवार मैदान में उतरे, जिनमें मोहित यादव ने एक साथ उपाध्यक्ष और सचिव दोनों पदों पर अपनी दावेदारी ठोक कर मुकाबला और दिलचस्प बना दिया।
ऐन मौके पर ‘वॉकओवर’ और निर्विरोध निर्वाचन
वोटिंग के बीच एक और नाटकीय मोड़ तब आया जब धनंजय गुट के धर्मवीर सिंह शेखावत ने चुनाव से ठीक पहले अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। सभी सचिवों के सामने अपनी बात रखते हुए धर्मवीर ने कहा कि उनका नामांकन गलती से रह गया था, इसलिए वे इस रेस से हट रहे हैं। उनके इस कदम से बृजकिशोर गुट के अरिष्ट सिंघवी का कार्यकारी सदस्य पद पर निर्विरोध चुना जाना लगभग तय हो गया।
विवादों से भरा रहा है RCA का इतिहास
राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की कुर्सी हमेशा से ही राजनीतिक और कानूनी जंग का अखाड़ा रही है। दिसंबर 2022 में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे, जिन्होंने फरवरी 2024 में पद से इस्तीफा दे दिया था। अब एक बार फिर सत्ता के इस नए संग्राम पर सुप्रीम कोर्ट की लाल मोहर लग चुकी है।

