बारहदरी पर इको-फ्रेंडली गणपति विसर्जन के लिए पवित्र कुंड तैयार

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सर्व हिंदू समाज सोशल क्रांतिकारी महासंघ की पहल, आस्था व पर्यावरण संरक्षण का संगम

कोटा। सर्व हिंदू समाज सोशल क्रांतिकारी महासंघ की ओर से गणेशोत्सव के पावन पर्व पर जल स्रोतों की स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष बारहदरी पर विशेष इंतजाम किए गए हैं।

धार्मिक आस्था और प्रकृति रक्षा के इस अनूठे संगम के तहत बारहदरी परिसर में 10 गुणा 20 आकार का एक विशाल अस्थायी कुंड तैयार किया गया है। जहाँ श्रद्धालु इको-फ्रेंडली मिट्टी से निर्मित गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन कर सकेंगे।

कृत्रिम कुंड 2 फायर ब्रिगेड गाड़ियाँ से जल भराव किया गया हैं। गणेश भक्त अपने प्रिय गजानन की प्रतिमाओं को पूरे विधि-विधान और हर्षोल्लास के साथ विसर्जन के लिए लेकर भी कुंड स्थल पर पहुँचने लगे हैं।

​कार्यक्रम के औपचारिक शुभारंभ से पूर्व निर्मित कुंड का वैदिक मंत्रोच्चार और पूरे विधि-विधान के साथ पूजन किया गया। इस अवसर पर साध्वी नीति अंबा, सर्वहिंदू समाज सोशल क्रांतिकारी महासंघ के अध्यक्ष गोविंद नारायण अग्रवाल तथा इको फ्रेंडली गणपति क्लब के अध्यक्ष डॉ. एमएल अग्रवाल ने संयुक्त रूप से कुंड का पूजन कर विसर्जन प्रक्रिया का शुभारंभ किया।

संस्थापक महामंत्री राजाराम जैन ‘कर्मयोगी’ रावण सरकार ने बताया कि यह पहल पिछले कई वर्षों से पर्यावरण की रक्षा और धार्मिक परंपराओं को सुचारू रूप से निभाने के लिए की जा रही है, ताकि हमारी नदियों और ताल-तलैयों को दूषित होने से बचाया जा सके।

​कुंड पूजन के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए साध्वी नीति अंबा ने कहा कि भगवान गणपति इस समस्त ब्रह्मांड के देवता हैं, जो सृजन, लय और प्रलय को स्थापित करते हैं।

प्रकृति का अंततः प्रकृति में ही विलीन हो जाना ही इस ब्रह्मांड का अंतिम सत्य है। मिट्टी से बने गणपति जब जल में विसर्जित होते हैं, तो वे पुनः प्रकृति में समाहित हो जाते हैं। इसलिए विसर्जन के दौरान शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना अति आवश्यक है।

​सर्व हिंदू सोशल क्रांति के अध्यक्ष गोविंद नारायण अग्रवाल ने इस आयोजन को आस्था और प्रकृति संरक्षण का एक अद्भुत संगम करार दिया। वहीं, इको फ्रेंडली गणपति क्लब के अध्यक्ष डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने सभी नागरिकों से पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी की प्रतिमाओं को ही अपनाने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि पीओपी की मूर्तियों के स्थान पर मिट्टी से बनी मूर्तियों के विसर्जन से जल प्रदूषण और पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान से बचा जा सकता है। विसर्जन के पश्चात कुंड की मिट्टी का उपयोग पौधों के रोपण और संवर्धन के लिए किया जाएगा, जो प्रकृति को हरा-भरा रखने में मददगार साबित होगा।