नई दिल्ली। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप विभिन्न ऑडियंस के लिए अलग-अलग संदेश दे रहे हैं। उनका यह रणनीतिक तरीका पेट्रोलियम बाजार को स्थिर रखने के साथ-साथ ईरान पर निरंतर दबाव बनाए रखने का माध्यम है। इसे समझने की जरूरत है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मार्च महीने से लगातार ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने वाले समझौते की घोषणा कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अब तक कम से कम 38 बार ऐसा दावा किया है, लेकिन हर बार कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद 23 मार्च को एयर फोर्स वन में ट्रंप ने कहा था, ‘मेजर पॉइंट्स ऑफ एग्रीमेंट हो चुके हैं।’ मगर ईरान ने तुरंत इन वार्ताओं से इनकार कर दिया। इसके बाद ट्रंप के बयान और आक्रामक होते गए।
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को डील करने के लिए बेताब बताया और चेतावनी दी कि अगर डील नहीं हुई तो ईरान के पावर प्लांट्स को नष्ट कर दिया जाएगा। यह पैटर्न अप्रैल और मई में भी जारी रहा, जहां ट्रंप ने कई बार बहुत करीब या अगले एक-दो दिन में डील होने का दावा किया।
7 अप्रैल को ट्रंप ने सीजफायर की घोषणा की और कहा कि दोनों पक्ष बहुत आगे बढ़ चुके हैं, बस दो हफ्ते में एग्रीमेंट फाइनल हो जाएगा। लेकिन कोई फाइनल डील नहीं हुई। 15-17 अप्रैल के दौरान उन्होंने कहा कि ईरान सब कुछ मान चुका है और डील बहुत अच्छी लग रही है। 7 मई तक ट्रंप का कहना था कि डील किसी भी दिन हो सकती है।
जानकारों का मानना है कि ट्रंप अलग-अलग ऑडियंस को अलग मैसेज दे रहे हैं। पेट्रोलियम मार्केट को शांत रखने और ईरान पर दबाव बनाए रखने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
11 जून को ट्रंप ने प्लान्ड स्ट्राइक्स रद्द करने और ग्रेट सेटलमेंट की बात कही, यहां तक कि यूरोप में वीकेंड पर साइनिंग का दावा किया, जिसमें वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस अमेरिका का प्रतिनिधित्व करेंगे।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने इन रिपोर्ट्स को गलत बताया और कहा कि कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है। अमेरिका की अत्यधिक मांगों और नई शर्तों का जिक्र किया गया।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ मध्यस्थता कर रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर फाइनल एग्रीड टेक्स्ट पहुंचने की बात कही, लेकिन शुक्रवार तक कोई साइनिंग नहीं हुई। ट्रंप का लेटेस्ट दावा वीकेंड या सोमवार तक डील का था, जो 38वें या 39वें असफल भविष्यवाणी के रूप में गिना जा सकता है।
इस पूरे मामले में इंसाइडर ट्रेडिंग के संदेह भी उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के ऐलानों से पहले ऑयल और स्टॉक फ्यूचर्स में बड़े पैमाने पर शॉर्ट बेट्स लगाए गए, जिससे कुछ ट्रेडर्स को करोड़ों का फायदा हुआ।

