नौ दिन चली भागवत कथा की सोमवती अमावस्या पर पूर्णाहुति
कोटा। श्री धरणीधर जन सेवा संस्थान एवं समस्त धाकड़ समाज, कोटा के संयुक्त तत्वावधान में विनोबाभावे नगर स्थित खड़े गणेश जी रोड पर बने श्री धरणीधर गार्डन में पिछले नौ दिनों से चल रहे भव्य ‘श्रीमद भागवत कथा महोत्सव’ का सोमवार को सोमवती अमावस्या पर पूर्णाहुति, हवन और विशाल भंडारे के साथ संपन्न हुई।
कथा के अंतिम दिन बनेठ वाले गुरुदेव के दिव्य भजनों और विदाई प्रवचनों को सुनने के लिए पंडाल में पैर रखने तक की जगह नहीं बची। पूरा परिसर ‘बांके बिहारी लाल की जय’, धरणीधर भगवान की जय और ‘सांवरिया सेठ की जय’ के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठा। धाकड़ समाज के पदाधिकारियों सहित कोटा संभाग के हजारों श्रद्धालुओं ने इस ज्ञान यज्ञ में अपनी आहुति दी।
कथा व्यास बनेठ वाले गुरुदेव ने ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की त्रिवेणी बहाते हुए उपस्थित जनसमुदाय को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने जीवन की नश्वरता और भगवद् भक्ति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य को समय अनुकूल रहते हुए भगवान के भजन में लग जाना चाहिए, क्योंकि भगवान के बिना इस जीव की मुक्ति किसी भी जन्म में संभव नहीं है।
यदि सारा जीवन दुखों और उलझनों में ही बीत गया और मुख से हरि का नाम नहीं निकला, तो ऐसा जीवन व्यर्थ है। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि लोग अंतिम समय में ‘राम नाम सत्य है’ बोलते हैं, जबकि इस परम सत्य को जीवन की शुरुआत में ही स्वीकार कर लिया जाता, तो मनुष्य तमाम सांसारिक दुखों से बच जाता।
कथा के दौरान गुरुदेव ने ‘सृष्टि और दृष्टि’ के दिव्य भेद को समझाया। उन्होंने कहा कि सारी दुनिया भगवान की बनाई ‘सृष्टि’ में रहती है, लेकिन एक सच्चा भक्त हमेशा भगवान की ‘दृष्टि’ (कृपा दृष्टि) में निवास करता है। भगवान की इस विशेष दृष्टि को प्राप्त करने के तीन अचूक मार्ग हैं- सत्संग, सेवा और भजन।
उन्होंने गृहस्थ जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे नमक के बिना स्वादिष्ट से स्वादिष्ट सब्जी भी अधूरी रह जाती है, वैसे ही नारायण के बिना यह सारी दुनिया अधूरी और नीरस है।
प्रभु के दरबार का नियम बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान के मंदिर में जब भी जाएं, सादा और सहज बनकर जाएं। जो जितना सरल होकर जाता है, उस पर भगवान की उतनी ही सहज कृपा बरसती है।
विशिष्ट सूत्रों की व्याख्या करते हुए बनेठ वाले गुरुदेव ने समाज की विडंबना पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यह दुनिया सुनती तो गुरु की है, लेकिन मानती हमेशा मूर्खों की है, जिससे वह कष्ट पाती है।
मानव देह के अहंकार को तोड़ते हुए उन्होंने भावुक अंदाज़ में कहा कि ‘सिर पर साड़ी लाख की, और सिर के नीचे खाक की’ अर्थात इस नश्वर शरीर के श्रृंगार पर लाखों खर्च करने वाले यह भूल जाते हैं कि अंत में इसे मिट्टी में ही मिल जाना है।
पूर्णाहुति के विशेष प्रसंग पर व्यासपीठ से बोलते हुए बनेठ वाले गुरुदेव ने कहा कि भागवत कथा केवल सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि इसे जीवन में उतारने का महामंत्र है। नौ दिनों तक जिस भक्ति रस का पान श्रद्धालुओं ने किया है, उसे अपने आचरण में ढालना ही इस महोत्सव की सच्ची सफलता होगी।
गुरुदेव ने पुनः दोहराया कि जिस परिवार और घर में नियमित रूप से भगवान की जय-जयकार होती रहती है, वहाँ कभी दुखों का हाहाकार प्रवेश नहीं कर सकता।
उन्होंने समस्त धाकड़ समाज और आयोजन समिति को इस सफल एवं भव्य धार्मिक अनुष्ठान के लिए आशीर्वाद देते हुए कहा कि नारायण की सेवा और सत्संग से ही समाज में सुख, समृद्धि और आपसी समरसता का विस्तार होता है। कथा की समाप्ति पर भव्य महाआरती का आयोजन किया गया, जिसमें छप्पन भोग की झांकी सजाई गई।
श्री धरणीधर जन सेवा संस्थान के पदाधिकारियों और धाकड़ समाज के वरिष्ठ जनों ने व्यासपीठ की पूजना-अर्चना कर बनेठ वाले गुरुदेव का शॉल, श्रीफल और स्मृति चिन्ह भेंट कर भावभीना अभिनंदन किया। नौ दिनों तक निस्वार्थ भाव से सेवाएं देने वाले समाज के युवा स्वयंसेवकों और भामाशाहों को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया।

