श्री मंगलमय चमत्कारी धाम पर श्री नर्मदेश्वर स्थापना समारोह एवं पंच कुंडीय महायज्ञ
कोटा। श्री मंगलमय चमत्कारी धाम हनुमान सेवा समिति, विज्ञान नगर के तत्वावधान में आयोजित 10 दिवसीय विराट धार्मिक महोत्सव के अंतर्गत भगवान नर्मदेश्वर की स्थापना, शिव-पार्वती विवाह महोत्सव, भव्य पंच कुण्डीय महायज्ञ तथा श्रीमद् भागवत के मूल पाठ एवं संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है।
इस दौरान कॉमर्स कॉलेज मैदान में आयोजित इस भव्य कथा के तीसरे दिन कथाव्यास ‘भगवत भास्कर’ श्रीकृष्ण चंद्र ठाकुर महाराज ने व्यासपीठ से अमृत वर्षा करते हुए कहा कि जो भगवान का हो जाए, वही भागवत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि परमात्मा के नाभि कमल से ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ है।
हम सभी मनु की संतानें होने के कारण ही ‘मानव’ कहलाते हैं। ऋषियों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जो निरंतर शोध (रिसर्च) करे, वही ऋषि है; वास्तव में ऋषि ही प्राचीन काल के वैज्ञानिक थे।
समिति के महंत पं. अशोक तिवारी ने बताया कि 10 दिवसीय अनुष्ठान 15 मई तक निरंतर जारी रहेगा। कथा का समय 11 से 14 मई तक दोपहर 2 से सायं 6:30 बजे तक रहेगा। कार्यक्रम के दौरान पंडित पुरुषोत्तम लाल शर्मा, पंडित अशोक शर्मा, मनीष अग्रवाल, गणेश बना, दीनदयाल, उत्तम शर्मा, राजानंद शास्त्री, देवकीनंदन गुप्ता सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
शिव परिवार: समता और संतुलन का संदेश
महाराज ने शिव-पार्वती के स्वरूप की दार्शनिक व्याख्या करते हुए कहा कि माँ पार्वती ‘श्रद्धा’ का प्रतीक हैं और भगवान शिव ‘विश्वास’ का स्वरूप हैं। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि बिना श्रद्धा के विश्वास को जलना पड़ता है और बिना विश्वास के श्रद्धा को भटकना पड़ता है। जब ये दोनों मिलते हैं, तभी जीवन पूर्ण होता है।
शिव दरबार की विलक्षणता का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि जहाँ कार्तिकेय ‘पुरुषार्थ’ के प्रतीक हैं, वहीं भगवान गणपति ‘विवेक’ का स्वरूप हैं। जिस घर में श्रद्धा, विश्वास, पुरुषार्थ और विवेक का वास होता है, वहाँ कभी विषमता नहीं आती, अपितु समता बनी रहती है। उन्होंने उदाहरण दिया कि शिव परिवार के सभी वाहनों (सांप, मोर, चूहा, नंदी और शेर) में परस्पर नैसर्गिक बैर है, फिर भी वे एक साथ सामंजस्य से रहते हैं। यह हमें सिखाता है कि वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में प्रेम और एकता कैसे बनी रह सकती है।
साध्य हमेशा साधन से ऊँचा होता है
भक्तों को संबोधित करते हुए ठाकुर ने कहा कि भगवान की पूजा, संध्या आरती और गंगा स्नान जैसे कर्म ‘साधन’ हैं, जबकि परमात्मा की प्राप्ति ‘साध्य’ है। साध्य हमेशा साधन से ऊँचा होता है और सही साधन के मार्ग पर चलकर ही साध्य (ईश्वर) को प्राप्त किया जा सकता है।

