देव-शास्त्र-गुरु में अटूट श्रद्धा ही सम्यग्दर्शन का आधार: मुनि विवर्धनसागर महाराज

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कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने शनिवार को सारगर्भित प्रवचन देते हुए कहा कि केवल द्रव्यग्रंथों का अध्ययन या उनका ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रति अटूट श्रद्धा का भाव होना भी उतना ही आवश्यक है।

श्रद्धा से ही सम्यक ज्ञान का उदय होता है और वही आत्मकल्याण का वास्तविक मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि जिनका देव, शास्त्र और गुरु में अडिग विश्वास होता है तथा जो छह द्रव्य, सात तत्त्व और नौ पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करता है, वही सम्यग्दर्शन और सम्यक ज्ञान का अधिकारी बनता है। सम्यग्दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र से युक्त साधक ही मोक्षमार्ग पर अग्रसर होकर अंततः भगवत्त्व पद की प्राप्ति करता है।

कार्यक्रम में सकल दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला तथा चंद्रप्रभु दिगम्बर नवयुवक मंडल के सदस्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।