अनासक्ति और सम्यक दृष्टि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है: विवर्धनसागर महाराज

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कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में शुक्रवार को आयोजित धर्म सभा को संबोधित करते हुए विवर्धनसागर महाराज ने कर्मबंध के कारणों की व्याख्या करते हुए कहा कि राग, आसक्ति और पदार्थों के प्रति मोह जीव को कर्मों के बंधन में बांधते हैं, जबकि अनासक्ति और सम्यक दृष्टि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि इससे पूर्व सुबह विवर्धनसागर महाराज ससंघ ने स्वीट होम कॉलोनी स्थित आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दर्शन किए तथा अभिषेक और शांतिधारा संपन्न कराई। इसके बाद संघ रिद्धि-सिद्धि नगर स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर पहुंचा।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों का श्रवण करना पुण्य का अवसर है। मनुष्य को धर्म के मर्म को समझकर अपने जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने बताया कि पुद्गल में रूप, रस, गंध, स्पर्श और ध्वनि जैसी पर्यायें पाई जाती हैं, जबकि जीव अरूपी है।

ध्वनि के विभिन्न रूपों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समवशरण में भगवान की दिव्यध्वनि की महिमा बताई, जो विभिन्न भाषाओं में परिवर्तित होकर सभी जीवों के कल्याण का माध्यम बनती है।

उन्होंने कहा कि परिग्रह परिमाण व्रत के माध्यम से वस्तुओं के संग्रह की सीमा निर्धारित करने से उनके प्रति मोह और मूर्छा कम होती है। कर्मबंध के कारणों को जानकर और उनसे बचने का पुरुषार्थ करके जीव कर्मों से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

मिथ्यादृष्टि जीव आसक्ति के कारण बंधन में पड़ता है, जबकि सम्यग्दृष्टि जीव अनासक्ति का भाव अपनाकर कर्मबंध से बचने का प्रयास करता है।

मुनिश्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रावकों से राग-द्वेष का त्याग कर आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कर्मबंध के कारणों को समझकर उनसे दूर रहने वाला जीव आत्मशुद्धि के माध्यम से मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में चंद्रेश रांवका, पारस लुहाड़िया, जोनू बाकलीवाल, रमेश बड़जात्या, मनोज मित्तल, महावीर दलवासा, नवीन सांवला, सुशील बज सहित समाज के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।