धर्म करने के लिए किसी की आज्ञा की जरूरत नहीं: आर्यिका सौम्यनन्दिनी

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कोटा।श्री दिगम्बर जैन मंदिर महावीर नगर विस्तार योजना में पावन चातुर्मास कर रही आर्यिका सुयोग्यनन्दिनी माताजी ने प्रवचन करते हुए शनिवार को तत्वार्थ सूत्र का वाचन कराया। उन्होंने प्रवचन में कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की एकता का नाम ही मोक्षमार्ग है। सम्यक दर्शन का अर्थ होता है रूचि। रूचि जीव की जहां होती है, वहीं उसकी बुद्धि लगती है। जहां बुद्धि लगती है वहीं पुरुषार्थ होता है।

जीव अपनी रूचि के अनुसार कार्य करता है। उसका परिणमन उसी रूचि के अनुरूप होने लगता है। रूचि का नाम ही सम्यक दर्शन है और रूचि का नाम ही मिथ्या दर्शन है। सच्चे देव शास्त्र गुरु के प्रति रूचि का अर्थ है, उनके गुणों में रूचि। गुरू में रूचि होगी तो सच्चे देव शास्त्र गुरु जैसे गुण आत्मा में प्रकट करने का पुरुषार्थ होगा।

जब उन जैसे गुण आत्मा में प्रकट हो जाते है, तो हम भी देव शास्त्र गुरु जैसे परम् पद में स्थापित हो जाते हैं। संसार शरीर और भोगों में रूचि का नाम ही मिथ्या दर्शन है। अपनी रूचि हो पहचानने का पुरुषार्थ करें। सम्यक रूचि के अनुरूप पुरुषार्थ करें।

उन्होंने कहा कि धर्म करने के लिए किसी की आज्ञा या आदेश की आवश्यकता नहीं। स्वयं की निर्मल श्रद्धा और विवेक की आवश्यकता होती है। धर्म के प्रति मजबूत श्रद्धा होती है, उसे कोई भी धर्म कार्य करने से विचलित नहीं कर सकता, लेकिन जिसकी श्रद्धा परिस्थितियों के अनुसार चलायमान होती है। वो दूसरों की हाथ की कठपुतली बन कर धर्म के मार्ग से विचलित हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि संसार में धर्म योग वातावरण का मिलना भी बड़ा दुर्लभ है। व्यक्ति अपने धर्म का पालन निराकुलता से करेे। एक ही मां के गर्भ से जन्मे दो भाई अपने कर्मों के अनुसार एक नरक और दूसरा निर्वाण को प्राप्त होता है। सच्चे मार्ग का उद्घोष करने वाले सच्चे वीतरागी गुरु दुर्लभ हैं। और दुर्लभ हैं उनके मुख पर सच्ची जिनवाणी सुनने को मिलना।