कोटा। समय के साथ समाज की सोच और परंपराओं में आ रहे सकारात्मक बदलाव का एक अनुकरणीय उदाहरण कर्मयोगी सेवा संस्थान के तत्वावधान में देखने को मिला।
संस्थापक राजाराम जैन कर्मयोगी ने बताया जिला मुख्यालय स्थित रोटेदा रोड, गुरु धाम कॉलोनी में अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा के नेतृत्व में आयोजित 27वें वार्षिक श्राद्ध तर्पण कार्यक्रम के अंतर्गत शुक्रवार को सप्तमी तिथि पर बेटियों ने उन अनजन्मी और असमय काल-कवलित हुई बेटियों का तर्पण किया, जो कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक त्रासदी की शिकार हुईं।
कार्यक्रम के दौरान अंजली शर्मा, युविका मोदी, योगना महलानिया, तनु शर्मा, ऋषिका शर्मा, उन्नति शर्मा पीहू पीहू , ने पूरे विधि-विधान और श्रद्धा भाव से जल व तिल अर्पित कर दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की। संस्थान द्वारा आयोजित इस 27वें वार्षिक श्राद्ध तर्पण आयोजन में प्रारंभ से ही महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही है।
इसके साथ ही, संस्थान की ओर से वर्ष में दो बार हरिद्वार के लिए प्रस्थान करने वाली अस्थि विसर्जन यात्राओं में भी महिलाएं बराबरी से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इस अवसर पर राजाराम जैन, कर्मयोगी अनिल कुमार शर्मा, नीलम शर्मा, योगेश शर्मा, हेमंत सिंह, हरिराम मीणा तथा मदन लाल शर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहे।
महिलाओं को उत्तर कर्म का अधिकार
धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, महिलाओं द्वारा उत्तर कर्म (अंतिम संस्कार, पिंडदान व तर्पण) किया जाना पूरी तरह शास्त्र सम्मत है। गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि परिवार में योग्य पुत्र या पुरुष सदस्य न होने पर अथवा विशेष परिस्थितियों में पुत्री या पत्नी को भी अंतिम संस्कार व श्राद्ध कर्म करने का पूर्ण अधिकार है। तर्पण का यह पुरातन संदर्भ वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। त्रेतायुग में श्रीराम के वनवास के दौरान, बिहार के गया धाम स्थित फल्गु नदी के तट पर दिवंगत महाराजा दशरथ ने माता सीता को दर्शन देकर पिंड की मांग की थी। तब माता सीता ने स्वयं फल्गु नदी के बालू रेत से पिंड बनाकर अपने ससुर को अर्पित किया था और उनका उद्धार किया था।

