13 वर्षीया वर्षा कंवर के उपन्यास ने बटोरी सुर्खियाँ, सुरेन्द्र सिंह राव बने प्रदेशाध्यक्ष
कोटा। साहित्य, संस्कृति और भारतीय चिंतन की त्रिवेणी में डूबे दो दिवसीय आयोजन का रविवार को समापन हुआ। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, राजस्थान के 9वें प्रदेश अधिवेशन ने कोटा की साहित्यिक धरती पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। समापन सत्र में नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा के साथ-साथ पुस्तकालयों को साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बनाने का ऐतिहासिक प्रस्ताव भी पारित किया गया।
अधिवेशन में नवीन प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा करते हुए सुरेन्द्र सिंह राव को प्रदेश अध्यक्ष, विष्णु शर्मा हरिहर को प्रदेश महामंत्री, डॉ. केशव शर्मा को प्रदेश कोषाध्यक्ष, डॉ. ओमप्रकाश भार्गव को प्रदेश संयुक्त महामंत्री,प्रदेश संगठन मंत्री विपिन चंद्र, मंत्री मोनिका गौड़ तथा राजेन्द्र गौड़ को प्रदेश प्रचार संयोजक का दायित्व सौंपा गया।

कोटा महानगर के लिए महेश विजय सहित प्रदेश एवं जिला स्तर के विभिन्न दायित्वों की भी घोषणा की गई। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अन्नाराम शर्मा को लोक साहित्य का राष्ट्रीय समन्वयक मनोनीत किया गया।बाल साहित्य प्रदेश संयोजक उमेश चौरसिया बनाया गया।
मुख्य अतिथि प्रो. विमला डूंकवाल (कुलगुरु, कृषि विश्वविद्यालय कोटा), विनय कुमार महाराज, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल, राष्ट्रीय मंत्री भरत ठाकोर, प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अन्नाराम शर्मा, नवनिर्वाचित प्रदेशाध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह राव, प्रदेश महामंत्री विष्णु शर्मा हरिहर, प्रदेश कोषाध्यक्ष डॉ. केशव शर्मा एवं कोटा महानगर महेश विजय ने दीप प्रज्वलित कर सत्र का शुभारम्भ किया।
साहित्य ही वास्तविक समाज सेवा: प्रो. विमला डूंकवाल
समापन सत्र की मुख्य अतिथि प्रो. विमला डूंकवाल, कुलगुरु, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा ने कहा कि जो रचना समाज और राष्ट्र के हित को साधती है, वही वास्तविक साहित्य है। उन्होंने कहा कि मोबाइल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस युग में साहित्य को नवीन आयाम देने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाया कि साहित्य को ऑडियो रूप में युवाओं तक पहुँचाया जाए ताकि वे सुनकर उससे जुड़ सकें।
आत्मबोध से विश्वबोध: डॉ. पवनपुत्र बादल
‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषयक व्याख्यान में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने कहा कि इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव भारतबोध है, जिसकी जड़ें सनातन परम्परा में निहित हैं। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में भारत की परम्पराओं को विकृत करने का कुत्सित प्रयास हुआ, किन्तु भारत की सनातन परम्परा अखण्ड एवं अजेय है।
विनय कुमार जी महाराज ने कहा कि भारत का मूल ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता है जो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कथित है। उन्होंने कहा कि परिषद का यह नौवाँ महाधिवेशन शुभ संकेत है, क्योंकि नौ का अंक पूर्णता का प्रतीक है।

