सरकार को किसान से ज्यादा उद्योगपतियों की चिंता- अन्ना हजारे

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कोटा। 80 वर्षीय समाजसेवी अन्ना हजारे ने कहा कि पिछले 22 वर्षों में देश में 12 लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। फिर भी सरकारें चुप रही। इजराइल में जमीन उपजाऊ नहीं, सिंचाई का पानी कम है, फिर भी वे एग्रीकल्चर में हमसे आगे हैं।

उनसे सीख लेकर सरकार कृषि नीति में चार बातों पर सुधार करे। आज भी किसान को पैदावार पर खर्च आधारित दाम नहीं मिल रहे। जिससे किसान चिंतित हैं।  शुक्रवार को प्रेस क्लब में पत्रकारों से उन्होंने कहा कि सभी राज्यों कृषि मूल्य आयोग है, लेकिन वहां की एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी सभी जिंसों के कृषि मूल्य निकालकर सरकार को भेज देती है।

कृषि आयोग में किसानों की भागीदारी नहीं होने से आज दाम 50 प्रतिशत तक गिर गए। इसलिए राज्यों में कृषि मूल्य आयोग को स्वायŸाता दें। किसान प्रतिनिधियों को उसमें शामिल करें। किसान को निर्धारित दाम नहीं मिलने पर सरकार उसकी भरपाई करे।

दूसरा, किसानों का सामूहिक बीमा किया जाता है, जबकि बाढ़, भूकंप या आपदा आने पर किसान को व्यक्तिगत बीमा का लाभ दिया जाए ताकि वह फिर से खड़ा हो सके।

तीसरा, सरकार ने बूंद-बूंद सिंचाई सिस्टम पर 18 प्रतिशत जीएसटी लागू कर किसानों की नींद उड़ा दी। सिंचाई की नई तकनीक अपनाने पर कर को बोझ क्यों थोपा गया, इस तत्काल हटाया जाए। सरकार ने नीति आयोग तो बनाया, लेकिन सही नीति स्पष्ट नहीं की। 

चौथा, 60 वर्ष से अधिक उम्र के किसान जिसके परिवार की कोई आय न हो, बच्चों की सर्विस न हो, उन्हें 5 हजार रू पेंशन दी जाए ताकि वे परिवार चला सके। प्रेस क्लब अध्यक्ष गजेंद्र व्यास, सचिव जितेंद्र शर्मा, सहित पदाधिकारियों ने अन्ना को मानपत्र भेंट कर सम्मानित किया। संचालन प्रतापसिंह तोमर ने किया।

भ्रष्टाचार विरोधी जनअभियान समिति के विजय पालीवाल ने बताया कि इससे पहले सुबह सीएडी सर्किल पर अन्ना चौक पर उनका भव्य स्वागत किया। बाद में एलन कॅरिअर इंस्टीट्यूट जाकर कहा कि यहां युवा भारत दिखता है। मुझे देश बदलना है, यह सोचकर हर कार्य करो। जो वोट लेकर भी कोई सुधार नहीं कर रहे उनको उखाड़ फेंको। दोपहर में उन्होंने किसानों को संबोधित किया।

एक सत्र में 40 विधेयकों में संशोधन कर दिए
अन्ना ने कहा कि सरकार किसानों की चिंता दूर करने की बजाय उद्योगपतियों के हित साधने में जुटी है। मोदी सरकार ने संसद के एक सत्र में 40  विधेयकों में चौंकाने वाले संशोधन किए।

एक विधेयक में प्रावधान था कि कंपनियां अपनी आय से 7.5 प्रतिशत धन किसी राजनीतिक दल को दान कर सकती थी, उसमें संशोधन कर दिया कि कंपनियां कितना भी धन पार्टियों को दान में दे सकती है। पिछले 5 माह में बड़ी कंपनियों ने राजनीतिक दलों को 90 हजार करोड़ रू की राशि का दान दिया।

लोकपाल कानून की धाराओं को कमजोर किया
उन्होंने कहा कि लोकपाल कानून की मांग को लेकर 2011 में हुए जनआंदोलन से देश खड़ा हुआ। उसमें तीन मुख्य प्रावधान थे, क्लास-1,2 व 3 के अफसर लोकपाल के दायरे में हों, प्रत्येक राज्य में लोकायुक्त हों और तीसरा, संशोधन के लिए उसमें जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने धारा-63 में संशोधन कर तीनों मुद्दों को पारित कर दिया। अभी राज्यों में जो लोकायुक्त हैं, वे लोकपाल कानून के अनुसार प्रभावी नहीं हैं। फिर मोदी सरकार ने संसद में एक बिल पारित किया, जिसके अनुसार, अधिकारी, उनकी पत्नी व बच्चों के नाम जो सम्पत्ति है, उसे 31 मार्च तक घोषित कर दे।

इससे सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसे खुला करने का रास्ता खोल दिया। एक अच्छे कानून को संशोधित कर उसे कमजोर कर दिया। 27 से 29 जुलाई,17 तक सरकार ने संसद में बिना कोई चर्चा किए मात्र तीन दिन में एक कानून बना दिया। नीति और नीयत में फर्क होने से इन दिनों नए घोटाले सामने आ रहे हैं। वित्त विधेयकों में संशोधनों पर सदन में चर्चा क्यों नहीं कराई जाती। ये हुकुमशाही लोकतंत्र के लिए खतरा है।

‘करेंगे या मरेंगे’ अनशन 31 मार्च को
एक सवाल के जवाब में अन्ना ने कहा कि मैने कांग्रेस सरकार को 82 पत्र भेजे, जवाब न मिलने पर देशव्यापी जनआंदोलन खड़ा किया। इस सरकार को विभिन्न मुद्दों पर 22 पत्र लिखें, आज तक एक का जवाब नहीं मिला। इसलिए 23 मार्च को ‘करेंगे या मरेंगे’ आव्हान पर अनशन करेंगे।

मैं 80 वर्ष की उम्र में 22 राज्यों में 30 सभाएं कर चुका हूं। जब उनसे पूछा कि दिल्ली में जो हो रहा है, उस पर खामोश क्यों हैं। अन्ना ने कहा कि मेरे दिल में जो है, वह मुझे पता है। लेकिन केजरीवाल के दिल में क्या है, यह वही जानें।