बाहरी रंगों में उलझने के बजाय, आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानें: विवर्धनसागर

0
4

कोटा। सेंट की संगति नहीं, संत की संगति करें। मनुष्य को यदि भगवत्ता की ओर बढ़ना है तो संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलना होगा। दिगम्बर मुनि बनकर ही पूर्ण भगवत्ता को प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन जब तक वह अवस्था प्राप्त न हो, तब तक श्रावक धर्म में अणुव्रतों का पालन करते हुए क्रमशः मोक्षमार्ग की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

यह उद्बोधन गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने मंगलवार को रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में दिया।

धर्मसभा में मुनिश्री ने जैन दर्शन के पुद्गल द्रव्य की अवधारणा को सरलता से समझाते हुए कहा कि संसार में दिखाई देने वाली सभी मूर्त वस्तुएं पुद्गल द्रव्य के अंतर्गत आती हैं। मकान, शरीर, वाहन, आभूषण सहित जो कुछ भी दिखाई देता है, वह पुद्गल है। पुद्गल द्रव्य में स्पर्श, रस, गंध और वर्ण ये चार गुण अनिवार्य रूप से विद्यमान होते हैं।

उन्होंने वर्ण के संबंध में बताया कि संसार में दिखाई देने वाले अनेक रंग मूल रूप से पांच प्रमुख वर्णों के आधार पर समझे जाते हैं। काला, नीला, पीला, लाल और सफेद प्रमुख वर्ण हैं तथा अन्य रंग इनके सम्मिश्रण से बनते हैं।

उन्होंने कहा कि व्यवहार की दुनिया में मनुष्य अनेक बाहरी आकर्षणों और भेदों में उलझ जाता है, जबकि अध्यात्म का लक्ष्य इनसे ऊपर उठकर आत्मा की शुद्ध अवस्था की ओर बढ़ना है।

मुनिश्री ने कहा कि आत्मा अमूर्तिक है, जबकि पुद्गल मूर्तिक है। सिद्ध परमेष्ठी सभी प्रकार के वर्णों से रहित होते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को बाहरी भौतिक आकर्षण के बजाय आत्मिक उन्नति, संयम और सदाचार को जीवन का आधार बनाने की प्रेरणा दी।

सामाजिक विषय पर मुनिश्री ने समाज में बढ़ रही विजातीय शादियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज की परंपराओं और संस्कारों की रक्षा के लिए विवाह संबंधों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक समाज को अपने संस्कारों और परंपराओं को सुदृढ़ बनाए रखना चाहिए। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि जैन धर्म के सिद्धांत सभी के लिए खुले हैं और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी सामाजिक पृष्ठभूमि से आता हो, जैन धर्म के सिद्धांतों को अपनाकर उनका पालन कर सकता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और मुनिश्री के प्रवचन का श्रवण कर धर्मलाभ लिया।