विदेशी खाद्य तेलों का आयात बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार पर असर

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मुम्बई। क्रूड खनिज तेल के बढ़ते वैश्विक बाजार मूल्य से भारत के नीति निर्माताओं के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं लेकिन खाद्य तेलों का ऊंचा भाव उन्हें ज्यादा परेशान नहीं कर रहा है। आपूर्ति एवं उपलब्धता की जटिल स्थिति एवं आयात खर्च में हो रही बढ़ोत्तरी के कारण खाद्य तेल की कीमतों में पिछले कुछ महीनों से तेजी-मजबूती का माहौल बना हुआ है।

वार्षिक आधार पर अप्रैल 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई की दर खाद्य तेल एवं वसा में 9.2 प्रतिशत बढ़ गई जबकि मार्च में भी इसमें 7 प्रतिशत का इजाफा हुआ था। निकट भविष्य में इससे राहत मिलने की संभावना बहुत कम है क्योंकि घरेलू एवं वैश्विक बाजार की परिस्थितियों में ज्यादा बदलाव नहीं आ सकेगा।

विदेशी खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता बढ़कर 60 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है इसलिए यहां अत्यन्त विशाल मात्रा में विदेशी खाद्य तेल नियमित रूप से मंगाया जा रहा है। दूसरी ओर विभिन्न कारणों से निर्यातक देशों में खाद्य तेलों का भाव तेज होता जा रहा है।

क्रूड खनिज तेल के अभाव एवं ऊंचे मूल्य के कारण इंडोनेशिया एवं मलेशिया जैसे पाम तेल के शीर्ष उत्पादक एवं निर्यातक देशों को बायो डीजल के निर्माण एवं उपयोग का नियम बदलना पड़ रहा है।

इंडोनेशिया में बायो डीजल के निर्माण में 40 प्रतिशत पाम तेल के उपयोग का अनिवार्य नियम पहले ही लागू हो चुका है जबकि जुलाई से इसका स्तर बढ़ाकर 50 प्रतिशत निर्धारित किए जाने की संभावना है। मलेशिया और थाईलैंड में भी पाम तेल का स्तर बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।

इससे वहां पाम तेल के निर्यात योग्य स्टॉक में कमी आ रही है जबकि चालू वर्ष में अब तक इसके दाम में 18 प्रतिशत की भारी वृद्धि हो गई है। इसी तरह सोयाबीन तेल एवं सूरजमुखी तेल के दाम में भी 13 से 19 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो चुकी है। रुपया का जबरदस्त अवमूल्यन होने से स्थिति और भी खराब हो गई है।