अमेरिका ने ईरानी नौकाओं एवं मिसाइल ठिकानों पर किया हमला

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नई दिल्ली। US-Iran War: अमेरिका द्वारा ईरान के दक्षिणी हिस्से में सैन्य कार्रवाई के बाद मंगलवार को एशियाई बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली। इससे बाजार में तनाव और बढ़ गया है, क्योंकि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध खत्म करने को लेकर अब तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया है।

ब्रेंट क्रूड की कीमत 1.5 प्रतिशत बढ़कर 97.56 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। हालांकि सोमवार को इसमें 7 प्रतिशत की भारी गिरावट आई थी। वहीं अमेरिकी कच्चा तेल डब्ल्यूटीआई 91.25 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यह शुक्रवार के मुकाबले अब भी करीब 5.5 प्रतिशत नीचे है। सोमवार को अमेरिका में मेमोरियल डे की छुट्टी के कारण बाजार बंद था।

अमेरिका ने ईरान में किए सैन्य हमले
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कहा कि उसने ईरान के दक्षिणी हिस्से में मिसाइल लॉन्च साइट्स और बारूदी सुरंग बिछाने वाली नौकाओं को निशाना बनाया। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई उसके सैनिकों की सुरक्षा के लिए की गई।

ईरानी मीडिया के अनुसार, बंदर अब्बास और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास धमाकों की आवाजें सुनी गईं। युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में विदेशी जहाजों की आवाजाही लगभग रोक दी है। इससे दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई और तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत तक उछाल आया।

ईरान के विदेश मंत्री और उसके मुख्य वार्ताकार सोमवार को कतर की राजधानी दोहा पहुंचे, जहां अमेरिका के साथ संभावित समझौते पर बातचीत हुई। दोनों देशों ने कहा है कि शुरुआती समझौते पर प्रगति हुई है। इसके तहत युद्ध रोका जाएगा और अंतिम समझौते के लिए 60 दिन का समय दिया जाएगा।

जापानी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते के तहत ईरान 30 दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य से बारूदी सुरंगें हटाएगा। इसके बाद सभी देशों के जहाज सुरक्षित तरीके से वहां से गुजर सकेंगे।

बाजार को समझौते का इंतजार
केसीएम ट्रेड के मार्केट एनालिस्ट टिम वाटरर ने कहा कि बाजार को उम्मीद है कि अगर समझौता हो जाता है तो लंबे समय से फंसे तेल टैंकर फिर से चलना शुरू हो जाएंगे। जहाजों के डेटा से पता चला है कि हाल के दिनों में एलएनजी और कच्चा तेल लेकर कई जहाज पाकिस्तान, चीन और भारत की ओर रवाना हुए हैं।

ट्रंप की चेतावनी से बढ़ी चिंता
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने फिर दोहराया कि ईरान अपना समृद्ध यूरेनियम अमेरिका को सौंपे ताकि उसे नष्ट किया जा सके। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप के इस बयान से साफ है कि आखिरी समय में भी समझौता टूट सकता है, जैसा पहले कई बार हो चुका है।