देवदर्शन मोक्ष का पथ, प्रतिमा के माध्यम से भगवान का स्मरण करें: विवर्धन सागर

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कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने द्रव्य संग्रह के संदर्भ में जीव, पुद्गल और आकाश सहित जैन दर्शन के विभिन्न तत्वों की व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन को समझने का संदेश दिया।

मुनि विवर्धनसागर महाराज ने कहा कि देवदर्शन भी मोक्ष का पथ है। जिनदर्शन को पापों का नाशक और मोक्ष का साधन बताया गया है। उन्होंने कहा कि दर्शन में केवल बाहरी औपचारिकता नहीं, बल्कि वास्तविक आध्यात्मिक भाव होना चाहिए। पाषाण में भगवान को देखने के बजाय प्रतिमा के माध्यम से मूर्तिमान भगवान का स्मरण करना चाहिए। जिनालय और जिनप्रतिमाएं आत्मचिंतन तथा भगवान के गुणों के स्मरण का माध्यम हैं।

उन्होंने एक दार्शनिक के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि अनेक मंदिरों के दर्शन करने के बाद उसने एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर की वेदी पर यह संदेश अंकित कराया गया कि संकेत को भगवान न मानकर उसके माध्यम से भगवान को समझने का प्रयास किया जाए। उन्होंने कहा कि प्रतिमा का दर्शन इस भाव को जागृत करे कि भगवान के गुणों का स्मरण हो और आत्मा को उसी दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिले।