थोक महंगाई दर शून्य के करीब, क्या होगा गिरावट का असर?

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नई दिल्ली।थोक महंगाई दर शून्य के बेहद करीब पहुंच गई है। थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में महंगाई दर महज 0.33 फीसदी रही। यह अगस्त में 1.08 फीसदी थी और 2018 की इसी अवधि के 5.22 फीसदी दर्ज की गई थी। तीन साल में पहली बार यह नकारात्मक होती दिख रही है। आमतौर पर महंगाई कम होने से उपभोक्ता खुश होते हैं, लेकिन यदि यह शून्य के करीब आ जाए या नकारात्मक हो तो टेंशन बढ़ जाती है। ऐसा क्यों है आइए समझते हैं…

महंगाई दर में अधिक गिरावट का मतलब होता है कि अर्थव्यवस्था में कुछ गड़बड़ है। ऐसा तब होता है जब सप्लाई की तुलना में डिमांड कम हो जाती है और कंपनियों की प्राइसिंग पावर खत्म हो जाती है।

थोक महंगाई में इस तरह की गिरावट का अर्थ होता है कि अर्थव्यवस्था पर डिमांड का भारी दबाव है। इससे रिजर्व बैंक पर कर्ज और सस्ता करने का भी दबाव बनेगा। हालांकि, केंद्रीय बैंक लगातार पांच बार नीतिगत दरों में कटौती कर चुका है, लेकिन बैंक इसका पूरा लाभ ग्राहकों को देने से बच रहे हैं।

कम महंगाई=कम आमदनी
महंगाई दर में कमी का एक बड़ा कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों का नीचे रहना है। यह उपभोक्ताओं के लिए अच्छी खबर है, लेकिन ग्रामीण इनकम पर बुरा असर पड़ता है, क्योंकि इसका मतलब है कि किसानों की आमदनी कम होगी। कम महंगाई दर का यह भी मतलब है कि सामान्यतौर वेतन वृद्धि भी कम होगी, जबकि EMI का बोझ अधिक नहीं घटा है।