भागवत कथा का सातवां दिन: राधा और कृष्ण दो नहीं, बल्कि एक ही तत्व के दो रूप हैं

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केवल मनोरथ से नहीं पुरुषार्थ से सिद्ध होते हैं लक्ष्य: श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर

कोटा। कॉमर्स कॉलेज मैदान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का गुरुवार को भव्य पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन विख्यात कथा व्यास श्री कृष्ण चंद्र ठाकुर महाराज ने व्यास पीठ से भक्ति, राष्ट्रवाद और कर्मयोग की ऐसी अविरल धारा बहाई कि पाण्डाल में मौजूद हजारों श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कथा के समापन पर महाराज श्री ने आध्यात्मिक गूढ़ रहस्यों को सुलझाते हुए समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए कर्मठ बनने का आह्वान किया।

कथा की शुरुआत में महाराज श्री ने राधा-कृष्ण के अभिन्न स्वरूप की व्याख्या की। उन्होंने मधुर भजन “राधा गोरी-गोरी” की मनमोहक प्रस्तुति देते हुए कहा कि राधा और कृष्ण दो नहीं, बल्कि एक ही तत्व के दो रूप हैं।

उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि “राधा ही कृष्णा है और कृष्ण ही राधा है।” इसी क्रम में उन्होंने राजस्थान, विशेषकर जयपुर और कोटा की महिमा का बखान करते हुए इन्हें ‘दूसरा वृंदावन’ की संज्ञा दी।

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उन्होंने कहा कि जिस धरा पर जयपुर में गोविंद देव जी और कोटा में प्रथम पीठ मथुराधीश प्रभु व श्रीनाथजी की गादी विराजमान हो, वह भूमि साक्षात वैकुंठ के समान है। यह वैष्णवों, भक्तों और कर्मयोगियों की भूमि है।

विद्यार्थियों और युवाओं को संदेश देते हुए महाराज श्री ने कहा कि कोटा आज पूरे देश के लिए शिक्षा का केंद्र है, लेकिन यहाँ के युवाओं को ‘कर्मयोगी’ बनना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल इच्छाएं पालने या मनोरथ करने से सफलता नहीं मिलती। इसके लिए बौद्धिक, शारीरिक और मानसिक श्रम की आहुति देनी पड़ती है।

गीता के श्लोक का संदर्भ देते हुए उन्होंने ‘मामनुस्मर युध्य च’ की युक्ति समझाई, जिसका अर्थ है कि ईश्वर को हृदय में धारण कर निरंतर अपने कर्तव्य पथ पर डटे रहो। समाज हित में लक्ष्य तय करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है।

कथा के दौरान महाराज श्री ने भारत की सांस्कृतिक पहचान और इतिहास पर भी बेबाकी से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि ‘इंडिया’ हमारे देश का मूल नाम नहीं हो सकता। उन्होंने ऐतिहासिक विसंगतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि पांडवों की राजधानी ‘इंद्रप्रस्थ’ का नाम बदलकर दिल्ली कर दिया गया।

उन्होंने सरकारों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि लाल किले को तो सहेजा गया, लेकिन महाभारत कालीन पांडवों के किले और उनके अवशेषों की उपेक्षा की गई। इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन पांचाल (वर्तमान पंजाब) की जल संपदा, गुरुद्वारों की सेवा परंपरा और वहां के लोगों की अटूट निष्ठा की जमकर प्रशंसा की।

सामाजिक सरोकारों पर बोलते हुए उन्होंने अन्न की बर्बादी को महापाप बताया और दान की महिमा पर प्रकाश डाला। महाराज श्री ने कहा कि दान और यज्ञ करने से संपत्ति घटती नहीं, बल्कि हजार गुना होकर भंडार में वापस आती है। उन्होंने धर्म की रक्षा का संकल्प लेने पर जोर देते हुए कहा कि “धर्मो रक्षति रक्षितः”—अर्थात यदि आप धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म आपकी रक्षा करेगा।

उन्होंने भारत के उन गौरवशाली राजघरानों को याद किया जहाँ राजा स्वयं भूखा रह जाता था, लेकिन अपनी प्रजा को भूखा नहीं सोने देता था। अंतिम सत्र में उन्होंने संतोष की महत्ता बताते हुए कहा कि संतुष्ट व्यक्ति कभी दरिद्र नहीं होता। सुदामा जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि वे गरीब अवश्य थे, लेकिन उनके पास संतोष रूपी धन था, इसलिए वे दरिद्र नहीं थे।

उन्होंने स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते हुए रहीम दास जी का दोहा उद्धृत किया कि मांगने से व्यक्ति का आत्मबल मर जाता है। कथा के अंत में “काली कमली वाले पे वारी-वारी जाऊं” और “सबसे ऊंची प्रेम सगाई” जैसे भजनों पर श्रद्धालु झूम उठे। महाआरती और छप्पन भोग के प्रसाद वितरण के साथ इस आध्यात्मिक महोत्सव का मंगल समापन हुआ।

इस दौरान पंडित महंत अशोक तिवारी, विधायक संदीप शर्मा, महारानी कल्पना देवी, राजेश बिरला, चैन सिंह राठौड़, अनूप दुबे, पुनीत चतुर्वेदी, मुकेश जैन, पंकज शर्मा, संजय शर्मा, आनंद राठी, संजय अग्रवाल, रणछोड़ अग्रवाल, विकास शर्मा, राजेंद्र खंडेलवाल, गिरधर लाल बडेरा, प्रणय दुबे, नरेंद्र सैनी, सुरेश अग्रवाल, दिलीप सिंह, अजय चतुर्वेदी, विवेक मित्तल, कपिल शर्मा समेत कई लोग मौजूद रहे।