केंद्र सरकार की भू अभिलेखों को ई-कोर्ट से जोड़ने की योजना

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार जमीन संपत्तियों के पंजीकरण की प्रक्रिया को आसान-सरल बनाने के लिए भूमि अभिलेखों को ई-कोर्ट से जोड़ने की योजना बना रही है। सरकार का मामना है कि इससे संदिग्ध हस्तांतरण, विवाद नियंत्रित करने और अदालतों पर बोझ कम करने में मदद करेगा।

ई-कोर्ट को भूमि अभिलेखों और पंजीकरण डाटाबेस से जोड़ने की पायलट परियोजना को उत्तर प्रदेश और हरियाणा के साथ महाराष्ट्र में सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है और जल्द ही इसे पूरे देश में लांच किया जाएगा।

सरकार की योजना ई-कोर्ट को भूमि अभिलेखों और पंजीकरण डाटाबेस को जोड़ने की है जिससे वास्तविक खरीदारों को यह जानने में मदद मिलेगी कि वे जिस जमीन को खरीदने की योजना बना रहे हैं क्या वह किसी कानूनी विवाद में तो नहीं है। कानून मंत्रालय में न्याय विभाग ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से संपत्ति विवादों के त्वरित निपटारे के लिए राज्य सरकारों को भूमि अभिलेखों और पंजीकरण डाटाबेस को ई-कोर्ट और राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (एनजेडीजी) के साथ एकीकृत करने के लिए मंजूरी प्रदान करने का आग्रह किया है। 

इस पर अभी आठ हाईकोर्ट ने जवाब दिया है। ये त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड और हिमाचल प्रदेश हैं। इस साल अप्रैल में न्याय विभाग द्वारा भेजे गए पत्र में कहा गया था कि इस संदर्भ में, यह सराहनीय होगा यदि आप अपनी तरफ से राज्य सरकारों को अन्य कार्यों के साथ भूमि अभिलेखों और पंजीकरण डाटाबेस को ई-कोर्ट से जोड़ने के लिए राज्य सरकार को आवश्यक मंजूरी प्रदान करने में त्वरित कार्रवाई की सुविधा मुहैया करा सकते हैं ताकि ई-कोर्ट के राष्ट्रव्यापी लांच को सफल बनाया जा सके। 

पत्र के मुताबिक, संपत्ति का आसान तथा पारदर्शी तरीके से पंजीकरण करना उन मानकों में से एक है जिसके आधार पर विश्व बैंक कारोबार करने की सुगमता के सूचकांक पर 190 वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन का आकलन करता है। भूमि संसाधन विभाग संपत्ति सूचकांक पंजीकरण के लिए जिम्मेदार नोडल विभाग है और उसे भूमि प्रशासन सूचकांक की गुणवत्ता के लिए कुल 13 अंकों में से केवल 3.5 अंक मिले हैं।

समिति का गठन
पत्र में कहा गया है कि भूमि पंजीकरण को आसान बनाने के लिए ई-कोर्ट को भूमि अभिलेख तथा पंजीकरण डाटाबेस से जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ई-समिति के साथ एक समिति बनाई गई थी। इसके पीछे तर्क था कि अगर किसी भूमि/भूखंड की कानूनी स्थिति का सही तरीके से पता चलता है और लोगों को इसकी जानकारी दी जाती है तो इससे वास्तविक खरीदारों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि इस जमीन पर कोई विवाद तो नहीं है।