धर्म और आत्मसाधना को बनाएं जीवन का आधार: मुनि विवर्धनसागर

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कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत विवर्धनसागर महाराज ने द्रव्य संग्रह ग्रंथ की गाथा की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव तीनों कालों में चार प्रमुख प्राणों इंद्रिय, मन-वचन-कायबल, श्वासोच्छ्वास तथा आयुबल के आधार पर जीवन धारण करता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का वास्तविक जीवन उसकी आत्मा से संचालित होता है, क्योंकि आत्मा अविनाशी, शाश्वत और अमर है। शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अनंत यात्रा की पथिक है।जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि जीव भगवान का स्मरण कर ले, तो उसका कल्याण संभव हो जाता है। इसलिए सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मकल्याण की साधना करना ही मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए।]

मुनिश्री ने विश्वविजेता सिकंदर का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब उसने एक मुनिराज से अपनी शेष आयु के बारे में पूछा तो उत्तर मिला कि उसके जीवन के केवल तीन दिन शेष हैं। यह सुनकर उसने देश-विदेश से श्रेष्ठ वैद्यों और हकीमों को बुलाया, किंतु मृत्यु को कोई रोक नहीं सका।

तब सिकंदर ने अंतिम इच्छा व्यक्त की कि उसके अंतिम संस्कार के समय उसके दोनों हाथ ताबूत के बाहर खुले रहें, ताकि संसार यह देख सके कि जो व्यक्ति पूरी दुनिया जीतने निकला था, वह भी खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही चला गया। धन, वैभव और साम्राज्य सब यहीं रह जाते हैं, साथ केवल कर्म और धर्म ही जाते हैं।

मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं महामंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं चित्र अनावरण के साथ हुआ। यह विधि सकल जैन समाज के अध्यक्ष प्रकाश बज, संजय बांझल, टीकम पाटनी, मुकेश मंगल एवं अशोक सांवला ने संपन्न कराई। कार्यक्रम में सकल दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।