मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर से निकली भव्य चक्रवर्ती दिग्विजय यात्रा
कोटा। आरकेपुरम स्थित मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर, त्रिकाल चौबीसी के तत्वावधान में आर्यिका विभाश्री माताजी एवं आर्यिका विनयश्री माताजी के सानिध्य में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतर्गत रविवार को विशेष पूजा-अर्चना के साथ तीर्थंकरों को अर्घ्य समर्पित किए गए।
मंदिर समिति के अध्यक्ष अंकित जैन ने बताया कि प्रातः विशेष पूजा-अर्चना के उपरांत समवशरण में विराजित जिनेंद्र देव का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। विधानाचार्य पंडित जितेंद्र शास्त्री एवं स्वतंत्र भैया के सान्निध्य और निर्देशन में सिद्धचक्र महामंडल विधान किया जिसमें श्रद्धालुओं द्वारा विधिवत अर्घ्य समर्पित किए गए।
समिति उपाध्यक्ष लोकेश जैन बरमुंडा ने बताया कि सायंकाल चक्रवती इन्द्र ज्ञानचंद जैन,संजय—तृप्ति जैन के स्व निवास से चक्रवर्ती भव्य दिग्विजय यात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में चक्रवती इंद्र परिवार हाथी पर सवार रहे। वहीं सोधर्म इंद्र के रूप में एस के जैन परिवार घोड़े पर विराजमान रहे। अन्य इंद्र बग्घियों में सवार होकर बैंड-बाजों एवं लवाजमे के साथ यात्रा नगर भ्रमण को निकली।
दिग्विजय यात्रा के दौरान मार्ग में स्थान-स्थान पर पुष्पवर्षा कर श्रद्धालुओं ने स्वागत किया। जैन श्रद्धालु नृत्य करते हुए जिन प्रभावना करते नजर आए। इन्द्र अपने हाथो से मोती व अर्शिफा लुता रहे थे और श्रृद्धालु महावीर के जयकारो के साथ नाचते गाते आगे बढ रहे थे।
महिला मंडल की भव्य नाटिका
रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम में धार्मिक नाटिका में भारत—बाहुबली युद्ध मंचन किया गया, जिसमें धर्म, त्याग और वैराग्य के संदेश को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया गया। नाटिका को उपस्थित श्रद्धालुओं ने सराहना के साथ देखा।
धर्म और धन पर प्रवचन
आर्यिका विभाश्री माताजी ने प्रवचन में धर्म और धन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। श्रद्धालुओं को बताया गया कि जो व्यक्ति धर्म को छोड़कर केवल धन के पीछे भागता है, उसका पतन निश्चित है। जबकि धर्म के पथ पर चलने वाला व्यक्ति कभी अभावग्रस्त नहीं होता। धर्म के बिना धन का कोई मूल्य नहीं है और धर्मयुक्त धन ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने भरत चक्रवर्ती की दिग्विजय यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने 60 हजार वर्षों में छह खंडों पर विजय प्राप्त कर धर्मध्वजा फहराई थी।

