Diksha Mahotsav: मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर में 32वां दीक्षा महोत्सव आज

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सिद्धचक्र महामंडल विधान में 32 अर्घ अर्पित किए

कोटा। Diksha Mahotsav: आरकेपुरम स्थित मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर, त्रिकाल चौबीसी परिसर के तत्वावधान में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान में बुधवार को श्रद्धालुओं ने गहन आस्था एवं श्रद्धा के साथ 32 अर्घ अर्पित किए। यह आयोजन आर्यिका विभाश्री माताजी एवं आर्यिका विनयश्री माताजी के मंगल सान्निध्य में संपन्न हुआ। मंदिर परिसर मंत्रोच्चार, अभिषेक एवं विविध धार्मिक अनुष्ठानों से दिनभर गुंजायमान रहा।

मंदिर अध्यक्ष अंकित जैन ने बताया कि प्रातः 6 बजे से मंत्रजाप, सहस्त्रनाम धारा, अभिषेक, शांतिधारा एवं विधान सहित विविध अनुष्ठान विधिपूर्वक आयोजित किए गए। पाद-प्रक्षालन, शास्त्र भेंट एवं दीप प्रज्वलन का सौभाग्य सकल दिगंबर जैन समाज के कार्यध्यक्ष जे.के. जैन, महामंत्री पदम बड़ला तथा कुन्हाड़ी मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा को प्राप्त हुआ।

समिति उपाध्यक्ष लोकेश जैन बरमुंडा ने बताया कि आर्यिका विभाश्री माताजी का 32वां दीक्षा जयंति महोत्सव गुरुवार, को प्रातः 9 बजे आयोजित किया जाएगा। विधान एवं पूजन के उपरांत आचार्य विराग सागर महाराज एवं गुरुमाता पूजन, पिच्छी परिवर्तन, संगीतमय विधान तथा वस्त्र भेंट कार्यक्रम आयोजित होंगे।

निर्देशक विनोद टोरड़ी ने बताया कि कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। सकल समाज अध्यक्ष प्रकाश बज ने जानकारी दी कि दीक्षा जयंति के सफल आयोजन हेतु विभिन्न समितियों का गठन कर दायित्वों का वितरण किया जा चुका है।

बैठक में परम संरक्षक विमल नांता, महामंत्री पदम बड़ला, मनोज जैसवाल सहित अनेक समाज प्रतिनिधि उपस्थित रहे। पूजन थाली सजाने में श्रमण सेवा युवा मंडल, आर.के.पुरम सहित महिला, युवा एवं पुरुष संगठनों की सक्रिय भूमिका रहेगी।

मनुष्य की आवश्यकता कम, इच्छा असीमित
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका विभाश्री माताजी ने कहा कि मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएं सीमित होती हैं, किंतु उसकी इच्छाएं असीमित हैं। उन्होंने कहा कि पहले संसाधन कम थे, परंतु संतोष अधिक था। आज भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं, फिर भी तुलना और दिखावे के कारण व्यक्ति मानसिक रूप से अशांत है। माताजी ने स्पष्ट किया कि विषय-वासना और भौतिक आकर्षण एक ऐसी अग्नि है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, किंतु भीतर निरंतर मानसिक पीड़ा उत्पन्न करती है। सम्यक दृष्टि वाला जीव संसार में रहते हुए भी आत्मकल्याण का मार्ग खोज लेता है, जबकि मोह और माया में उलझा व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है।