वॉशिंगटन। US India Trade Deal: भारत और अमेरिका के रिश्ते इस समय बेहद तनाव भरे दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका ने भारत के ऊपर भारी टैरिफ लगाया है और यह दुनिया के सबसे ज्यादा टैरिफ वाले देशों में से एक बन गया है। ये चीन से भी ज्यादा है, जो ट्रंप के चुनाव अभियान के दौरान उनके निशाने पर था।
खास बात है कि 2025 की शुरुआत में भारत और अमेरिका के संबंध नई ऊंचाइयों पर जाते दिखाई दे रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन शुरुआती विदेशी नेताओं में थे, जिन्होंने ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद मुलाकात की थी। फरवरी में हुई यह मुलाकात ट्रंप के आपसी टैरिफ लागू करने की योजना पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद हुई थी।
लेकिन एक साल के अंदर दोनों देशों के रिश्ते एक उतार-चढ़ाव भरे दौर से गुजरते रहे हैं और बातचीत के लंबे दौर के बाद भी ट्रेड डील पर सहमति नहीं हो पाई है। एक्सपर्ट का कहना है कि भारत और अमेरिका के पास समझौते पर पहुंचने के लिए मजबूत आधार है।
अमेरिका को चीन के बाहर भरोसेमंद सप्लाई चेन पार्टनर की जरूरत है और भारत बड़े पैमाने पर क्षमता प्रदान करता है। वहीं, नई दिल्ली को अपनी निर्यात के लिए अमेरिकी बाजार तक पहुंच की जरूरत है। इसके बावजूद बातचीत एक रुकावट पर अटक गई है।
पिछले सप्ताह ही नई दिल्ली में एक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल ने बातचीत का एक और दौर खत्म किया, जिसमें कोई सफलता नहीं मिली। हालांकि, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने मोदी और ट्रंप के बीच बातचीत को शानदार बताया।
पूर्व अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और यूएस-इंडिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फोरम में सीनियर एडवाइजर मार्क लिंसकोट ने कहा कि मुझे लगता है कि सबसे बड़ी रुकावट राजनीतिक इच्छाशक्ति है। उन्होंने आगे कहा कि टैरिफ और कृषि हमेशा मुश्किल होते हैं।
अमेरिका भारत के साथ अपने ऊर्जा और कृषि उत्पादों की बिक्री बढ़ाना चाहता है। भारत ने ऊर्जा सोर्सिंग के मौके पर केवल आंशिक सहमति दी है और राजनीतिक रूप से संवेदनशील कृषि क्षेत्र तक पहुंच का विरोध कर रहा है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने इस महीने की शुरुआत में सीनेट को बताया कि भारत में कुछ फसलों और अन्य मांस व उत्पादों का विरोध है। उन्होंने कहा कि ये बहुत मुश्किल काम है।
अमेरिका भारत पर रूसी तेल के आयात में कटौती को लेकर दबाव बना रहा है। वॉशिंगटन का कहना है कि भारत के तेल आयात से रूस पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर पा रहा है। इससे मॉस्को क यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में मदद मिलती है। अगस्त में अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने को लेकर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया, जिससे कुल शुल्क बढ़कर 50% हो गया।
हालांकि, अमेरिका ने स्वीकार किया है कि नई दिल्ली ने रूसी तेल आयात में कटौती की है, लेकिन इस महीने की शुरुआत में भारत आए व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि मॉस्को भारत को ईंधन की निर्बाध आपूर्ति करने को तैयार है।
भारत ने आधिकारिक तौर पर रूस से तेल आयात में कटौती के बारे में नहीं कहा है। रॉयटर्स ने बीते बुधवार को रिपोर्ट किया कि भारतीय रिफाइनर्स ने नवम्बर में रूसी कंपनियों से तेल खरीदना फिर से शुरू कर दिया है जो अमेरिकी प्रतिबंधों का हिस्सा नहीं थीं और भारी छूट दे रही हैं।
रूसी तेल के बाद भी रहेगा पेच
एक्सपर्ट्स का मानना है कि रूस और यूक्रेन के बीच शांति समझौते होने पर भारत पर 25% टैरिफ खत्म हो जाएगा लेकिन अमेरिका के लिए कृषि बाजार में पहुंच बड़ी रुकावट बनी रहेगी, जिससे ट्रेड डील में देरी होगी। अमेरिका चाहता है कि भारत जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें खरीदे और डेयरी एक्सपोर्ट की अनुमति दे। दोनों का देश की घरेलू कृषि लॉबी कड़ा विरोध करती हैं।

