नई दिल्ली। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के पहले चरण में पशु आहार और सोयाबीन तेल से जुड़े प्रावधानों को लेकर नई तस्वीर सामने आई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका को सूखा अनाज आधारित पशु आहार पर बहुत सीमित रियायत दी गई है।
यह छूट कोटा आधारित है और कुल घरेलू खपत का केवल एक छोटा हिस्सा कवर करती है। इससे बाजार और किसानों पर बड़े असर की आशंका को कम बताया जा रहा है।
अधिकारियों के मुताबिक भारत ने डीडीजीएस यानी सूखा अनाज आधारित पशु आहार पर सिर्फ 5 लाख टन तक शुल्क रियायत दी है। देश में पशु चारे की कुल खपत करीब 500 लाख टन है। इस हिसाब से अमेरिकी कोटा सिर्फ एक फीसदी बैठता है। सरकार का कहना है कि यह आयात घरेलू कमी को पूरा करने और चारे की लागत को स्थिर रखने में मदद करेगा।
अधिकारियों ने बताया कि डीडीजीएस के सीमित आयात से मक्का और सोयाबीन जैसे कच्चे माल पर दबाव कम होगा। इससे इंसानों के खाने लायक अनाज को पशु चारे में लगाने की जरूरत घटेगी। पोल्ट्री, डेयरी, एक्वाकल्चर और पशुपालन क्षेत्र को लागत में उतार-चढ़ाव से राहत मिलने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि इससे खाद्य मुद्रास्फीति को काबू में रखने में भी मदद मिल सकती है।
बढ़ती मांग के कारण पहले भी हुआ आयात
पिछले कुछ वर्षों में मांग बढ़ने के कारण भारत को पशु आहार और उससे जुड़े उत्पादों का आयात करना पड़ा है। वर्ष 2021 में घरेलू कीमतों के दबाव के चलते करीब 15 लाख टन सोयाबीन मील आयात किया गया था। छह लाख टन से अधिक पशु आहार श्रीलंका, चीन, अमेरिका, थाईलैंड और नेपाल से आया। इसके अलावा म्यांमार, यूक्रेन, सिंगापुर और यूएई से मक्का तथा अफ्रीकी देशों से सोयाबीन का आयात भी हुआ है।
सोयाबीन तेल और चारे पर उद्योग सतर्क
व्यापार समझौते के मसौदे का खाद्य तेल और सोयाबीन प्रसंस्करण उद्योग ने सतर्क स्वागत किया है। समझौते के तहत अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा। बदले में भारत अमेरिकी औद्योगिक सामान, सोयाबीन तेल, पशु चारा, अखरोट और कुछ फलों पर शुल्क घटाएगा या खत्म करेगा। हालांकि उद्योग जगत टैरिफ कटौती, कोटा व्यवस्था और गुणवत्ता मानकों के स्पष्ट विवरण का इंतजार कर रहा है।
कीमत और जीएम उत्पादों पर सवाल
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा कि भारत सोयाबीन तेल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए यह कदम अवसर भी हो सकता है। अभी अमेरिका से आने वाला तेल शुल्क के कारण महंगा पड़ता है और अर्जेंटीना के मुकाबले 30 से 40 डॉलर प्रति टन ज्यादा कीमत पर आता है। उद्योग संगठनों ने यह भी कहा कि अभी साफ नहीं है कि जेनेटिकली मोडिफाइड और गैर-जीएम उत्पादों पर सरकार क्या रुख अपनाएगी।

