नई दिल्ली। खाद्य तेलों (Edible Oil) के ग्लोबल बाजार में उथल-पुथल का दौर आ गया है। क्योंकि इस समय खाद्य तेलों का उपयोग सिर्फ खाने के लिए नहीं बल्कि जैव ईंधन के रूप में भी हो रहा है। इससे मोटरगाड़ियां चलाने से लेकर हवाई जहाज उड़ाने का काम हो रहा है। तभी तो इसकी कीमतों में कुछ ज्यादा ही उतार-चढ़ाव दिख रहा है।
भारत में खाद्य तेलों के उत्पादक कंपनियों के संघ, इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (Indian Vegetable Oil Producers’ Association) के अध्यक्ष और इमामी एग्रोटेक (Emami Agritech) के सीईओ, सुधाकर देसाई का कहना है कि खाद्य तेलों में उथल-पुथल चलती रहेगी।
कुआलालंपुर में आयोजित हो रहे यूओबी के हियान सम्मेलन (UOB Kay Hian Conference) को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि व्यापार में बदलाव, जैव ईंधन (Biofuel) की बढ़ती मांग और आपूर्ति में कमी के कारण यह स्थिति बनी है।
IVOA Chief देसाई ने कहा कि दुनिया में भू-राजनीतिक बदलावों ने व्यापार के रास्तों को बदल दिया है। इससे मुनाफे के मौके कम हो गए हैं और ऊर्जा की कीमतों, मुद्राओं के उतार-चढ़ाव और सरकारी नीतियों के झटकों का असर खाद्य तेल बाज़ारों पर तेज़ी से पड़ रहा है।
उन्होंने कहा, अब तो सिर्फ शुल्कों (Duties), नियमों या व्यापार के तरीकों में छोटे-मोटे बदलाव भी पूरी आपूर्ति श्रृंखला में कीमतों को बहुत ज़्यादा ऊपर-नीचे कर रहे हैं।”
उत्पादन में मामूली बढ़ोतरी
दुनिया भर के खाद्य तेलों (Edible Oil) की स्थिति के बारे में बताते हुए देसाई ने कहा कि 2025-26 तक चार मुख्य वनस्पति तेलों का उत्पादन 208.4 मिलियन टन होने का अनुमान है। यह पिछले साल के मुकाबले बहुत मामूली बढ़ोतरी है।
पाम तेल और रेपसीड तेल का उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन सूरजमुखी तेल का उत्पादन अभी भी सीमित है। उन्होंने कहा “खाद्य तेलों के उत्पादन में यह धीमी बढ़ोतरी मौसम और सरकारी नीतियों में किसी भी गड़बड़ी से वैश्विक आपूर्ति को कमज़ोर बनाती है। इससे तेलों के बीच प्रतिस्पर्धा कड़ी बनी रहेगी और कीमतों में अस्थिरता रहेगी।” उल्लेखनीय है कि इस समय सूरजमुखी तेल की कीमत लगातार ज़्यादा बनी हुई है।
जैव ईंधन ने खेल बिगाड़ा
इस समय जैव ईंधन की बढ़ती मांग की वजह से वेजीटेबल ऑयल की कीमतें प्रभावित हुई हैं। सिर्फ इंडोनेशिया को ही देखें तो वहां बायोडीजल प्रोग्राम में करीब 14 मिलियन टन पाम ऑयल का इस्तेमाल करता है। दूसरी तरफ, अमेरिका की जैव ईंधन नीतियां सोयाबीन तेल की कीमतों को प्रभावित कर रही हैं। देसाई ने कहा, “खाद्य तेल अब सिर्फ़ खाने की चीज़ें नहीं रह गई हैं, बल्कि ऊर्जा से जुड़ी ज़रूरी चीज़ें बन गई हैं। इससे उनकी कीमतें बढ़ गई हैं और वे कच्चे तेल की कीमतों और सरकारी नीतियों के साथ ज़्यादा जुड़ गई हैं।”
भारत में कितना उत्पादन
भारत की बात करें तो, 2025-26 के तेल वर्ष (अक्टूबर – सितंबर) में घरेलू खाद्य तेल उत्पादन 9.6 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यह अपनी घरेलू कुल ज़रूरत का सिर्फ़ 40% ही है। इसलिए भारत को इस साल करीब 16.7 मिलियन टन खाद्य तेलों का आयात करना पड़ेगा। इसमें 8 से 8.5 मिलियन टन पाम ऑयल, 5-5.5 मिलियन टन सोयाबीन ऑयल, 2.8-3 मिलियन टन सूरजमुखी तेल और करीब 200,000 टन अन्य तेल शामिल होंगे। नेपाल के रास्ते आने वाले शून्य-शुल्क वाले आयात (zero-Duty Imports) भी इसमें शामिल हैं। IVPA के अध्यक्ष ने बताया कि भारत का आयात बाज़ार तेलों की कीमतों के अंतर, खासकर पाम तेल और सोयाबीन तेल के बीच के प्रति बहुत संवेदनशील है।

