वॉशिंगटन/इस्लामाबाद/तेहरान। US- Iran Ceasefire: ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर हो गया। यह बात अभी तक किसी के गले नहीं उत्तर रही। वह कौनसे देश है जिन्होंने इसमें अपनी भूमिका निभाई है। आइये जानें!
समाचार एजेंसी ने दो अधिकारियों के हवाले से नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता के बीच चीन की एंट्री हुई। चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है उसने तेहरान को युद्धविराम के लिए समझाया। चीन ने ईरान को युद्धविराम के लिए मनाया और युद्धविराम के पक्ष में किया।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बातचीत में शामिल अधिकारियों ने बताया कि जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ रही थी चीनी अधिकारी ईरानी अधिकारियों के संपर्क में थे ताकि वे तेहरान को संघर्ष-विराम समझौते का कोई रास्ता निकालने के लिए प्रोत्साहित कर सकें।
सीजफायर समझौते की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी के हवाले से समाचार एजेंसी एपी ने बताया है कि बीजिंग मुख्य रूप से मध्यस्थों के साथ मिलकर काम कर रहा था जिनमें पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र शामिल थे। ऐसा करके वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा था।
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बातचीत में शामिल अधिकारियों ने कहा है कि मध्यस्थता के प्रयासों में पाकिस्तान सबसे आगे था लेकिन पर्दे के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच की खाई पाटने में मिस्र ने अहम भूमिका निभाई। गाजा में संघर्ष-विराम और ईरान में संघर्ष-विराम, दोनों में ही मिस्र की भूमिका निर्णायक रही। इन प्रयासों में तुर्की ने भी मदद की।
ईरान के सामने अमेरिका का सरेंडर
- ईरान में सत्ता परिवर्तन नाकाम-ईरान का शासन उसी इस्लामिक सरकार के अधीन है जिसे अमेरिका और इजरायल ने बार बार ‘आतंकी शासन’ कहा है। महीने भर से ज्यादा की लड़ाई के बाद ये शासन अब और मजबूत होकर उभरेगा। ईरान में सत्ता परिवर्तन की हर संभावना इस युद्धविराम के साथ करीब करीब खत्म माना जाए।
- होर्मुज पर ईरान को टोल का अधिकार-युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज एक सामान्य समुद्री रास्ता था लेकिन अब ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा। हफ्तों तक चले संघर्ष के बाद इस युद्ध से तेहरान की दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग पर प्रभाव और ज्यादा बढ़ गया है।
- ईरान में ही 450 किलो यूरेनियम-ईरान के 450 किलो समृद्ध यूरेनियम के भंडार को न तो जब्त किया गया है, न ही नष्ट किया गया है और न ही कहीं और ले जाया गया है। अमेरिका के लिए ये सबसे बड़ी नाकामी है।
- IRGC और मजबूत-अमेरिका और यूरोप ने IRGC को आतंकी संगठन घोषित कर रखा है। लेकिन युद्ध के दौरान नागरिक नेताओं की मौत के बाद IRGC ने देश का शासन बहुत हद तक अपने हाथों में ले लिया है। अमेरिका को अब IRGC के प्रभाव वाली सरकार से बात करनी होगी।
- मिसाइल क्षमता बरकरार-ईरान के पास मिसाइल और ड्रोन का विशाल भंडार अभी भी मौजूद है। जबकि अमेरिका की शर्त ईरानी मिसाइल प्रोग्राम को खत्म करना था। उसकी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता भी बनी हुई है और अब वो इसकी रेंज में और इजाफा करेगा। ईरान ने यह साबित कर दिया है कि वह अभी भी खाड़ी क्षेत्र में लंबी दूरी तक हमले कर सकता है। खाड़ी में उसका वर्चस्व अब और बढ़ गया है।
- युद्धविराम के लिए कोई जल्दबाजी नहीं-वो अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे जो बार बार युद्ध से भाग निकलने के लिए युद्धविराम करना चाहते थे। ईरान नहीं। तेहरान ने युद्धविराम पर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। वो अडिग रहा। उसने विरोधियों को अपने मजबूत इरादे का संकेत दे दिया है। इसका प्रभाव वर्षों तक देखा जाएगा।
- युद्धविराम के लिए भागते दिखे ट्रंप-डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम समझौते तक पहुंचने के लिए तमाम शर्तों को लिस्ट को ताक पर रख दिया। उन्होंने ईरान की शर्तों पर युद्धविराम किया है। ये उनका सरेंडर है। जिस होर्मुज को खुलवाने को वाइट हाउस अपनी जीत बता रहा है वो 28 फरवरी से पहले भी खुला था।
- अमेरिका-इजरायल के लक्ष्य अलग-अमेरिका और इजरायल अब युद्ध के लक्ष्यों को लेकर स्पष्ट रूप से बंटे हुए हैं। युद्ध के उद्देश्यों और स्वीकार्य अंतिम शर्तों को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच मतभेद अब और भी ज्यादा साफ हो गए हैं और ईरान ने इसी बात का फायदा उठाया है।
- अमेरिका को भारी नुकसान-इस युद्ध से अमेरिका के हथियार भंडार को बुरी तरह से नुकसान पहुंचा है। उसका एयर डिफेंस सिस्टम भंडार बुरी तरह खाली हुआ है। ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने के लिए उसे बड़े पैमाने पर मिसाइल इंटरसेप्टर्स इस्तेमाल करने पड़े हैं। इस भंडार को भरने अब अमेरिका को कई वर्ष लग जाएंगे।
- मिडिल ईस्ट में अमेरिका की विश्वसनीयता कमजोर-ईरान ने अमेरिका की मिडिल ईस्ट देशों में सुरक्षा देने वाले देश के तौर पर उसकी विश्वसनीयता को बुरी तरह से नुकसान पहुंचाया है। ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और कतर में भयानक हमले किए। अमेरिका इन देशों की रक्षा नहीं कर सका। एक वक्त ऐसा लगा कि अमेरिका ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है।
तेहरान में जश्न का माहौल है। ये उसकी क्षमता, उसके इरादे, ये उसकी हार नहीं मानने की जिद, ये उसकी वर्षों तक प्रतिबंधों में रहने के बावजूद जुझारूपन की जीत है। ये जीत एक सुपरपावर के घुटने टेकने की है। ये जीत वर्षों तक एक मिसाल रहेगी कि कोई भी देश अपने ताकत के घमंड में किसी और देश के अस्तित्व मिटाने की हिमाकत ना करे। ईरान ने ये लड़ाई अकेले लड़ी थी लेकिन उसने अपने से सौ गुना ताकतवर और घमंड में चूर देशों को अपने शर्तों पर युद्ध से भागने पर मजबूर कर दिया है।

