ताकत दिखाने की कोशिश में कहीं कांग्रेस को ही तो आघात नहीं पहुंचा रहे सचिन?

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-कृष्ण बलदेव हाडा-
कोटा। राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने के लिए पिछले चार सालों से लगातार छटपटा रहे प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट कल ने अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए अपने समर्थकों के विधानसभा क्षेत्रों में किसान सम्मेलन की आड़ में सभाएं करेंगे। लेकिन इन जनसभाओं के जरिए वे भारी भीड़ जुटाकर भले ही अपनी ताकत को जता दें, लेकिन कांग्रेस आलाकमान की सोच के चलते अब इस चुनावी साल में उनका मुख्यमंत्री बनने का सपना पूरा होने के आसार लगभग नगण्य हैं।

पिछले चार सालों में सचिन पायलट दो बार प्रदेश में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार को उखाड़ने की कोशिश कर चुके हैं और दोनों ही बार अशोक गहलोत के कुशल नेतृत्व और राजनीतिक चातुर्य के कारण उन्हें मात खानी पड़ी है।

कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के राजस्थान से होकर गुजरने के बाद पार्टी का आलाकमान सचिन पायलट को स्पष्ट संकेत दे चुका है कि अगले विधानसभा चुनाव तक पार्टी प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हटाकर किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने का जोखिम लेने की स्थिति में कतई नहीं है। क्योंकि यह चुनावी साल है और इस साल के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं।

पार्टी के रणनीतिकार इस बार इस कोशिश में जुटे हैं कि राजस्थान में हर बार पांच साल बाद सत्ता बदलने की रवायत को बदला जाए और येन केन प्रकारेण सत्ता बनाये रखने के लिये ऎसी ही कोशिश की जाएगी कि राजस्थान में फिर से बहुमत लाकर कांग्रेस की सरकार बनाई जाए। क्योंकि वर्तमान में राजस्थान ऐसा राज्य है, जहां उसकी मुख्य प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी गहरे अंतर कलह के दौर से गुजर रही है।

यहां राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी वसुंधरा राजे सहित आधा दर्जन से भी अधिक शक्ति केंद्र विकसित हो जाने के कारण इसका प्रतिकूल असर आने वाले विधानसभा चुनाव में पड़ना तय है और इस स्थिति का कांग्रेस भरपूर लाभ उठाना चाहती है।

हालांकि पार्टी यह भी जानती है कि पिछले चार सालों के सत्ता काल के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार अपनी सत्ता को बचाए रखने की कोशिश करते रहे, क्योंकि चार साल पहले जब अशोक गहलोत के नेतृत्व में तीसरी बार कांग्रेस की सरकार बनी थी तो उन्होंने पूर्व सचिन पायलट को अपनी सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपते हुए उपमुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन सचिन पायलट इससे खुश टीवी नजर नहीं आए।

क्योंकि उनका दावा तो मुख्यमंत्री पद पर था, जो उन्हें हासिल नहीं हो सका था। उनके समर्थक भी यह आरोप लगाते रहे कि सचिन पायलट को ही मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए था। पार्टी उनकी उपेक्षा कर रही है। जबकि सचिन पायलट और समर्थकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके पिता राजेश पायलट के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी ने उनके परिवार को पार्टी के सभी मंचों पर बेहतर मौके दिए।

स्वर्गीय राजेश पायलट की पत्नी रमा पायलट को लोकसभा विधानसभा चुनाव लड़ाया। खुद सचिन पायलट 25 साल की कम उम्र में न केवल सांसद बने, बल्कि बाद में केंद्र में मंत्री बने। कांग्रेस पार्टी ने युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति के तहत सचिन पायलट को न केवल कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया, बल्कि तीसरी बार जब प्रदेश में अशोक गहलोत की सरकार बनी तो उन्हें उपमुख्यमंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। वे राजनीतिक अनुभव के लिहाज से मिले इस यथोचित सम्मान को पचा नही पाये।

वैसे भी इससे अधिक की वे और उनके समर्थक अपेक्षा कैसे कर सकते हैं, जबकि प्रदेश में अशोक गहलोत जैसे अनुभवी और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ मौजूद हैं। सचिन पायलट को अगर हो सके तो यह गलतफहमी भी मन से निकाल देनी चाहिए कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सफलता उनकी वजह से मिली। क्योंकि उस चुनाव का भी नेतृत्व अशोक गहलोत के मजबूत जिम्मेदार और अनुभवी कंधों पर ही था।

सचिन पायलट 16 जनवरी को मारवाड़ क्षेत्र से अपने मित्रों-राजनीतिक सलाहकारों-समर्थकों के प्रभाव या निर्वाचन इलाकों में अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए किसान सम्मेलन आयोजित करने के अभियान की शुरुआत करेंगे। इसके तहत पहला कार्यक्रम जोधपुर संभाग के नागौर जिले के परबतसर में होगा और उसके बाद शेखावाटी अंचल के झुंझुनू जिले के गुढ़ा में भी ऐसा ही आयोजन किया जाना प्रस्तावित है।

जहां से उनके एक अन्य अनन्य भक्त बड़बोले राजेंद्र सिंह गुढ़ा आए दिन पार्टी-सरकार विरोधी अनर्गल बयानबाजी करने के बावजूद प्रदेश सरकार में सैनिक कल्याण मंत्री और कोटा संभाग में बारां जिले के प्रभारी मंत्री बने हुए हैं। अब सचिन पायलट की इन्हें जन सभाओं के जरिए भले ही भीड़ जुटाकर अपनी ताकत का अहसास कराने का मौका मिल जाए, लेकिन मुख्यमंत्री बनना अभी उनके लिए दूर की कौड़ी है।

उन्हें पार्टी नेतृत्व पहले ही प्रतीक्षा करने की कह चुका है और इसी सलाह को मानने में उनकी और पार्टी की भलाई भी है। क्योंकि ऐसा ना हो कि राज्य भर में दौरे करके अपने समर्थन पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश में कहीं वे प्रदेश में कांग्रेस का ही बंटाधार ना कर दे। अगर ऐसा हुआ तो यह भी उन्हें अच्छे से समझ लेना चाहिए कि फिर वे मुख्यमंत्री कहां के बनेंगे? पार्टी और अपनी बेहतरी के लिए सचिन पायलट को- “मैं नहीं तो और नही या कुछ भी नहीं ” की रणनीति को छोड़ देना चाहिए।