सोयाबीन उत्पादन के साथ इसके वैल्यू एडिशन पर ध्यान देना जरूरी: डॉ. नागर

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डॉ. प्रताप सिंह धाकड़ अभा सोयाबीन अनुसंधान समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मनोनीत

कोटा। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलपति डॉ. प्रताप सिंह धाकड़ को उनकी कृषि अनुसंधान के प्रति प्रतिबद्धता और सोयाबीन फसल पर उनके दशकों के अनुभव को देखते हुए ‘अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसंधान एवं विकास समिति’ का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुना गया है। डॉ. धाकड़ कोटा कृषि विवि में निदेशक अनुसन्धान के पद पर कार्यरत रहे हैं।

इस महत्वपूर्ण नियुक्ति की घोषणा हैदराबाद में आयोजित 56वीं अखिल भारतीय सोयाबीन अनुसंधान समूह की वार्षिक बैठक के दौरान की गई। राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के निदेशक डॉ. केएच सिंह ने बैठक के दौरान इस चयन की आधिकारिक घोषणा की।

इस अवसर पर पंडित जयशंकर प्रसाद तेलंगाना राज्य कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. बलराम सहित देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक और नीति निर्धारक उपस्थित रहे।

डॉ. प्रताप सिंह धाकड़ का सोयाबीन अनुसंधान से गहरा और पुराना नाता रहा है। उन्होंने एक लंबे समय तक कोटा रहते हुए सोयाबीन परियोजना में सस्य वैज्ञानिक (Agronomist) के रूप में कार्य किया है।

उनके शोध कार्यों ने राजस्थान में सोयाबीन की उन्नत खेती और फसल प्रबंधन की नई तकनीकों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी विशेषज्ञता का लाभ अब राष्ट्रीय स्तर पर सोयाबीन उत्पादकों और शोधकर्ताओं को प्राप्त होगा।

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में अपने विजन को साझा करते हुए डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में सोयाबीन के अनुसंधान के साथ-साथ इसके ‘वैल्यू एडिशन’ (मूल्य संवर्धन) पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हाड़ौती समेत मालवा और राजस्थान में सोयाबीन प्रचुर मात्रा में होती है।

वहीं अन्य क्षेत्रों में भी सोयाबीन उत्पादन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। इन संभावनाओं को पूर्ण आर्थिक लाभ में बदलने के लिए प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना अनिवार्य है। यदि क्षेत्र में सोयाबीन प्रसंस्करण उद्योग विकसित होते हैं, तो स्थानीय किसानों की आय में क्रांतिकारी वृद्धि हो सकती है।

डॉ. धाकड़ ने सोयाबीन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह एक ऐसी तिलहनी फसल है। जिसका तेल ही नहीं, बल्कि तेल निकालने के बाद बचा हुआ भाग भी विदेशों में भारी मात्रा में निर्यात किया जा सकता है।

इसके उत्पाद प्रोटीन से भरपूर होते हैं। जो कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। उनके नेतृत्व में समिति का मुख्य उद्देश्य उन्नत किस्मों का विकास करना और किसानों को बाजार से सीधे जोड़ना रहेगा। ताकि ‘खेत से बाजार’ तक की कड़ी मजबूत हो सके।