सोना-चांदी के बाद अब तांबा भी दिखा रहा तेवर, एक साल में कीमत 60% बढ़ी

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नई दिल्ली। सोने और चांदी की कीमत में पिछले साल काफी तेजी आई। लेकिन तांबे ने भी निवेशकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया। एमसीएक्स पर 29 दिसंबर को इसकी कीमत करीब 1,400 रुपये प्रति किलो के करीब पहुंची थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी कीमत 6 जनवरी को 6.069 डॉलर प्रति पौंड पहुंची जो एक साल पहले 3.802 डॉलर थी।

इस तरह एक साल में इसकी कीमत में करीब 60% तेजी आई है। वायरिंग और केबल में इसका व्यापक यूज होता है। लेकिन पिछले कुछ समय से इसकी सप्लाई टाइट बनी हुई है। यह वजह है कि इसकी कीमत में तेजी आई है और इसे नया चांदी कहा जा रहा है। चांदी ने पिछले साल सोने से करीब दोगुना रिटर्न दिया। माना जा रहा है कि इस साल कॉपर यह कमाल कर सकता है।

तांबे को चमत्कारी धातु कहा जाता है। माना जाता है कि लगभग दस हजार साल पहले जब इंसान ने पहली बार तांबे से औजार बनाना सीखा था तो वह इसे एक चमत्कारी धातु मानता था। इसकी खासियतों की वजह से इसे देवताओं का वरदान समझा जाता था। हजारों साल बाद यह लाल धातु एक बार फिर दुनिया की इकॉनमी के केंद्र में आ गई है। निवेशक और बड़े-बड़े उद्योग सभी इस सच्चाई को समझ रहे हैं कि दुनिया में विकास का अगला दौर एक बार फिर तांबे पर ही टिका है। यही वजह है कि तांबे की कीमत में आगे तेजी बनी रहने की उम्मीद है।

पिछले साल एमसीएक्स पर तांबे की कीमतों में 61% का उछाल आई। तांबे की कीमतों में यह जबरदस्त उछाल कुछ खास कारणों से आया है। AI डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक गाड़ियां, रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट और बिजली ग्रिड के विस्तार जैसी नई चीजें तांबे की मांग को बढ़ा रही हैं।

इनमें तांबे का जमकर यूज होता है। चीन का प्रॉपर्टी सेक्टर भले ही कई साल से मुश्किलों में है लेकिन बिजली और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी तांबे की मांग मजबूत बनी हुई है। भारत में भी मकानों की मांग लगातार बनी हुई है। इसने तांबे की मांग के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है।

एक तरफ जहां तांबे का मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर में इसकी सप्लाई पर भारी दबाव दिख रहा है। कई बड़ी खदानों में दिक्कतें आ रही हैं। दुनिया में तांबे के सबसे बड़े उत्पादक देश चिली में हड़तालें चल रही हैं।

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में भी उत्पादन में रुकावटें आ रही हैं। इंडोनेशिया की ग्रासबर्ग खदान ने ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित कर दिया गया है। दुनिया का करीब 3% तांबा इसी खदान से आता है। इन कारणों से तांबे की सप्लाई टाइट हो गई है।

हाल में यह संकट और गहरा गया है। चिली के उत्तरी हिस्से में कैप्स्टोन कॉपर की मंटोवर्टे तांबा खदान में हड़ताल शुरू हो गई है। इससे सप्लाई को लेकर चिंताएं फिर बढ़ गई हैं। वहीं, चीन की तांबा उत्पादक कंपनी टोंगलिंग नॉनफेरस ने इक्वाडोर में अपनी खदान के दूसरे चरण के लॉन्च में देरी की सूचना दी है।

इस बीच लंदन मेटल एक्सचेंज में तांबे का स्टॉक घटकर 142,550 टन रह गया है, जो 17 नवंबर के बाद सबसे कम है। एक अनुमान के मुताबिक 2026 में रिफाइंड तांबे के बाजार में 150,000 टन की कमी रहेगी।

इसकी वजह यह है कि खदानों में उत्पादन में लगातार रुकावटें आ रही हैं। साथ ही इसके ओर यानी अयस्क की गुणवत्ता गिर रही है। पुरानी खदानें कम उत्पादन कर रही हैं जबकि नई खदानों में निवेश बहुत महंगा है। साथ ही ही उन्हें चालू होने में सालों लग जाते हैं।

जानकारों का कहना है कि सप्लाई में भारी कमी, खदानों में बड़ी रुकावटें और बिजली, EVs, AI डेटा सेंटर और ग्रिड अपग्रेड से मजबूत मांग के कारण तांबा 13,000 डॉलर प्रति टन के रेकॉर्ड स्तर को पार कर गया है।

सप्लाई में ग्रोथ की तुलना में डिमांड कहीं ज्यादा तेज है। भू-राजनीति ने इस तेजी को और बढ़ा दिया है। माना जा रहा है कि अमेरिका रिफाइंड तांबे पर टैरिफ लगा सकता है। इस आशंका से तांबे की सप्लाई को अमेरिकी गोदामों की ओर मोड़ा जा रहा है। इससे COMEX में स्टॉक बढ़ रहा है।