कोटा। संध्याकालीन मंगल जिनदेशना के दौरान आचार्य प्रज्ञासागर मुनिराज ने मंडाना में उपस्थित विशाल श्रावक समाज को संबोधित करते हुए जीवन के दो प्रमुख मार्ग गृहस्थ धर्म और वैराग्य पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया।
आचार्य श्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति शादी करने या मुनि बनने के बीच दुविधा में है, तो उसे वैराग्य का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा वैराग्य के पद पर संकोच नहीं होना चाहिए। एक बार मुनि बनने का निर्णय ले लिया तो वापसी का मार्ग नहीं होता।
उन्होंने समझाया कि गृहस्थ जीवन में व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए, उचित समय पर यू-टर्न लेकर वैराग्य के मार्ग की ओर बढ़ सकता है, लेकिन वैराग्य में प्रवेश के बाद पीछे लौटना संभव नहीं।
आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा अच्छे मार्ग से पीछे मुड़ना गलत है, आगे ही बढ़ना चाहिए। गलत रास्ते पर चलने पर ही यू-टर्न लिया जाता है। अपने प्रवचन में आचार्य श्री ने बताया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान वृषभनाथ से लेकर भगवान महावीर स्वामी तक कुल 24 तीर्थंकर हुए, जिनमें 19 तीर्थंकरों ने गृहस्थ जीवन जिया, जबकि 5 तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी रहे।
उन्होंने कहा हम सबको तय करना है कि किस तीर्थंकर के आदर्शों पर चलना है। गृहस्थ होकर भी संयम, सत्य, पवित्रता और धर्म को अपनाया जाए, तो जीवन सार्थक हो सकता है।
आचार्य श्री ने यह भी स्पष्ट किया कि मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है और यह निश्चित नहीं कि फिर ऐसा अवसर मिले। इसलिए हर व्यक्ति को अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए धर्म, साधना और सदाचार की राह चुननी चाहिए।
धर्मसभा में गुरु आस्था परिवार के अध्यक्ष लोकेश जैन, चेयरमैन यतिश जैन खेड़ावाला, महामंत्री नवीन जैन दौराया, कोषाध्यक्ष अजय जैन खटकीड़ा सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

