शरीर से मन और मन से आत्मा तक की यात्रा ही सुखी होने का मार्ग: आचार्य प्रज्ञा सागर

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कोटा। विज्ञान नगर स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ने बुधवार को अपने प्रवचन में मन की निर्मलता और आत्म साधना का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जिन साधकों ने विकारों से मन को मुक्त कर लिया है, उन्हें एकांत की खोज नहीं करनी पड़ती, क्योंकि उनकी साधना हर स्थान पर संभव है।

ऐसे साधक हर स्थान पर आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं। शरीर से मन और मन से आत्मा तक की यात्रा ही सुखी होने का मार्ग है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन यह भावना करनी चाहिए कि जगत के सभी जीव सुखी रहें और जो दुखी हैं, वे जल्दी ही सुखी हों। यही भावना परमात्मा से मिलन का मार्ग है।

धर्मसभा का शुभारंभ और विशेष आयोजन
मंदिर समिति के अध्यक्ष राजमल पाटोदी ने बताया कि धर्मसभा की शुरुआत सन्मति जैन के मंगलाचरण से हुई। कार्यक्रम में चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन और पाद प्रक्षालन का आयोजन हुआ। जिनवाणी विराजमान करने का सौभाग्य विनोद टोरड़ी, महामंत्री, सकल दिगम्बर जैन समाज को प्राप्त हुआ।

48 दीपों की रोशनी में भक्ति का उत्सव
मंत्री पी.के. हरसोरा ने जानकारी दी कि सायंकालीन आरती, आनन्द यात्रा और भक्तामर पाठ के साथ आदिनाथ भगवान की आराधना की गई। इस अवसर पर अनिल ठौरा परिवार और अन्य समाज बंधुओं ने 48 दीप प्रज्ज्वलित किए।