कोटा। जैन धर्म का तप, त्याग और आत्मशुद्धि का पर्व पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व आज विधिवत रूप से प्रारंभ हुआ। आचार्य प्रज्ञासागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि दशलक्षण पर्व क्षमा से प्रारंभ होकर क्षमा पर ही समाप्त होता है, इसलिए क्षमा का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
उन्होंने कहा कि मानव का मूल स्वभाव क्रोध नहीं बल्कि क्षमा है। मनुष्य चाहे दिनभर कितनी ही देर क्रोध में रहे, अंततः वह शांत हो जाता है क्योंकि उसकी आत्मा का स्वभाव क्षमा ही है। गुरुदेव ने उदाहरण देते हुए कहा जैसे अग्नि के निकट पानी गर्म होता है और अग्नि के दूर होते ही शीतल हो जाता है, वैसे ही दृढ़ संकल्प और साधना से स्वभाव को भी परिवर्तित किया जा सकता है।
क्रोध के दुष्परिणाम बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि केवल 10 मिनट के क्रोध में आकर यदि कोई अनुचित कार्य हो जाए, तो 10 वर्षों तक उसकी सजा भुगतनी पड़ती है। यदि हम रूप-सौंदर्य के लिए बाहरी परिधान बदल सकते हैं, तो आत्मा को सुंदर बनाने के लिए स्वभाव क्यों नहीं बदल सकते? उन्होंने कहा कि क्षमा को वीरों का आभूषण है।
अध्यक्ष लोकेश जैन एवं महामंत्री नवीन दौराया ने बताया कि पर्व के पावन अवसर पर श्रावक संस्कार शिविर-2025 आगाज प्रज्ञालोक परिसर से हुआ। इस शिविर में स्थानीय एवं विभिन्न राज्यों से लगभग 400 श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया।
चैयरमैन यतिश जैन खेडावाला ने बताया कि शिविरार्थियों का दिन सुबह 5:30 बजे सामायिक से आरंभ होगा। इसके अंतर्गत मांगलिक पाठ, शांतिधारा, नित्य पूजा, गुरुदेव का मंगल प्रवचन, आहारचर्या, जाप, तत्त्वार्थ सूत्र की वाचन-व्याख्या, प्रतिक्रमण, आनंद यात्रा, भक्ति एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

