मुखमंडल की सुंदरता से अधिक मन की निर्मलता जरूरी: विभाश्री माता जी

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कोटा। विज्ञान नगर स्थित दिगंबर जैन मंदिर में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी एवं आर्यिका विनयश्री माताजी (संघ सहित) के निर्देशन में 13 पिच्छियों का भव्य चातुर्मास जारी है। अपने प्रवचन में रविवार को गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने भव्यमार्ग रहस्य प्रवचन के अंतर्गत चंद्रमा के प्रतीक के माध्यम से जीवन दर्शन समझाया।

उन्होंने कहा कि चंद्रमा तो रात में उदित होता है, परंतु उसकी शीतलता और रोशनी दिन भर प्रभाव डालती है। साधक को भी चंद्रमा की तरह बनना चाहिए। जो स्वयं शांत, सौम्य, आत्मसात हो और अपने आचरण से संसार को आलोकित करे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का मुखमंडल सुंदर हो, केवल यही पर्याप्त नहीं है।

यदि मन विकृत और चिंतन कलुषित है, तो वह मोहांधकार को जन्म देता है। इसके विपरीत जो साधक आत्मिक शुद्धि से जीवन को प्रकाशित करता है, वही अपूर्ण चंद्रमा नहीं बल्कि पूर्ण चंद्रमा होता है, जो अज्ञानता के अंधकार को मिटा सके। माता श्री ने स्वर्ग देव की व्याख्या करते हुए बताया कि स्वर्ग में देव चार प्रकार के होते हैं, भवनवासी, देव,व्यंतर देव, ज्योतिषी देव और वैमानिक देव।