नई दिल्ली। Purchasing Managers Index: मार्च महीने में भारत के निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार करीब साढ़े तीन साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से पैदा हुई ऊर्जा संकट और बाजार में अनिश्चितता का असर मांग और लागत दोनों पर देखने को मिला है। यह जानकारी S&P Global द्वारा जारी आंकड़ों में सामने आई है।
HSBC का फ्लैश इंडिया कंपोजिट पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी PMI मार्च में घटकर 56.5 रह गया, जो फरवरी में 58.9 था। यह स्तर अक्टूबर 2022 के बाद सबसे कम है। हालांकि, यह आंकड़ा अब भी 50 से ऊपर है, जो यह दिखाता है कि गतिविधियां लगातार 56 महीनों से बढ़त में बनी हुई हैं।
फ्लैश PMI शुरुआती संकेत देता है और इसे अंतिम आंकड़ों से करीब एक हफ्ता पहले जारी किया जाता है। यह कुल सर्वे प्रतिक्रियाओं के लगभग 90 प्रतिशत के आधार पर तैयार किया जाता है।
सर्वे में शामिल कंपनियों ने बताया कि बाजार में अस्थिरता, महंगाई का दबाव और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से बनी अनिश्चितता के कारण आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा है।
HSBC की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजल भंडारी के अनुसार, ऊर्जा से जुड़ी समस्याओं के चलते मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर दोनों में उत्पादन की रफ्तार धीमी हुई है। घरेलू मांग कमजोर रही, जिससे नए ऑर्डर की वृद्धि भी तीन साल से अधिक समय के सबसे धीमे स्तर पर रही, हालांकि निर्यात ऑर्डर में अच्छी बढ़त देखी गई।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का फ्लैश PMI मार्च में गिरकर 53.8 हो गया, जो फरवरी में 56.9 था। यह करीब साढ़े चार साल का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले सितंबर 2021 में यह 53.7 पर था।
वहीं, सर्विस सेक्टर का PMI भी मार्च में घटकर 57.2 रह गया, जो फरवरी में 58.1 था। यह जनवरी 2023 के बाद का सबसे कम स्तर है।
सबसे ज्यादा असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा है। कंपनियों का कहना है कि पश्चिम एशिया के तनाव से बाजार प्रभावित हुआ है, महंगाई बढ़ी है और मांग में कमी आई है। इसके चलते फैक्ट्री उत्पादन की वृद्धि अगस्त 2021 के बाद सबसे धीमी रही है।
अंतरराष्ट्रीय हालात और बढ़ती लागत के दबाव के बीच देश में कारोबारी गतिविधियों की रफ्तार मार्च में कुछ धीमी रही। सर्विस सेक्टर में बढ़ोतरी जनवरी 2025 के बाद सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई। कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय यात्रा में बाधाएं और अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव का असर कारोबार पर पड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों सेक्टर में नए ऑर्डर की रफ्तार कम हुई है। कुल बिक्री नवंबर 2022 के बाद सबसे धीमी गति से बढ़ी। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिलने वाले ऑर्डर में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें सर्विस सेक्टर की भूमिका सबसे ज्यादा रही।
कंपनियों की लागत में भी तेज बढ़ोतरी देखी गई। करीब चार साल में पहली बार इनपुट कॉस्ट इतनी तेजी से बढ़ी है। एल्युमिनियम, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, ऊर्जा, खाद्य पदार्थ, आयरन ओर, लेदर, तेल, रबर और स्टील जैसी चीजों की कीमतों में उछाल इसका बड़ा कारण रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कंपनियां बढ़ती लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल रही हैं और अपने मुनाफे में कटौती कर इसका कुछ हिस्सा खुद वहन कर रही हैं। इसके बावजूद मार्च में उत्पाद और सेवाओं की कीमतों में सात महीने की सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सर्विस सेक्टर में कीमतों का दबाव मैन्युफैक्चरिंग के मुकाबले ज्यादा रहा। यह स्थिति लागत और ग्राहकों से वसूली जाने वाली कीमत दोनों मामलों में देखी गई।
रोजगार के मोर्चे पर अच्छी खबर रही। मार्च में कंपनियों ने तेजी से भर्ती की और रोजगार सृजन अगस्त 2025 के बाद सबसे तेज रहा। कंपनियों का कहना है कि भविष्य में कारोबार बढ़ने की उम्मीद, लंबित ऑर्डर और नए काम मिलने की संभावना के चलते भर्ती में तेजी आई है।
यह सर्वे एसएंडपी ग्लोबल द्वारा किया जाता है, जिसमें करीब 400 मैन्युफैक्चरिंग और 400 सर्विस कंपनियों से जानकारी ली जाती है। जनवरी के मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई के अंतिम आंकड़े 2 अप्रैल को जारी होंगे, जबकि सर्विस और कंपोजिट पीएमआई के आंकड़े 6 अप्रैल को जारी किए जाएंगे।

