भारत, रूस और चीन की तिकड़ी से क्यों टेंशन में आ गए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप

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नई दिल्ली। भारत, रूस और चीन की तिकड़ी की एकजुटता दुनिया को बदल सकती है और यह 21वीं सदी एशिया की हो सकती है। यह विचार अकसर पेश किया जाता रहा है। लेकिन यह भी सच है कि फल तब तक डाली से टूटकर नहीं गिरता, जब तक पक न जाए। शायद अब तीनों देशों के साथ आने के विचार में अब वह मोड़ आ गया है।

इस बार शंघाई सहयोग संगठन की समिट पूरी दुनिया में चर्चा का केंद्र रही और लगभग हर तस्वीर पर डोनाल्ड ट्रंप की सीधी नजर थी और टिप्पणियां भी आती रहीं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह तमाम देशों पर टैरिफ लादे हैं और भारत पर सबसे ज्यादा टैक्स लगाया है, उससे इस गठजोड़ वाले विचार में और तेजी ला दी।

साफ है कि यदि वैश्विक कूटनीति में RIC कहे जाने वाले रूस, भारत और चीन इसी रास्ते पर चले तो अगले कुछ साल निर्णायक हो सकते हैं। रूस तो लंबे समय से इस एकता की पहल करता रहा है, लेकिन भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एवं कारोबारी स्तर पर भी प्रतिद्वंद्विता के चलते यह सिरे नहीं चढ़ पाया।

बता दें कि 1998 में रूसी प्रधानमंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने भारत यात्रा के दौरान RIC ‘स्ट्रैटेजिक ट्रायंगल’ का औपचारिक प्रस्ताव रखा था, जिसका उद्देश्य पश्चिमी गठबंधनों के मुकाबले एक बैलेंस बनाना था। इसके बाद 2006 में पहली बार RIC के नेताओं की मीटिंग हुई और 2007 में दिल्ली में तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने साझा हितों पर चर्चा की।

कुल मिलाकर 2002 से 2020 तक RIC की 20 से अधिक मंत्री स्तरीय बैठकें आयोजित हुईं, लेकिन यह अनौपचारिक संगठन कभी तेजी नहीं पकड़ सका। फिर 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव आने पर इस विचार को लगभग छोड़ ही दिया गया था, लेकिन ट्रंप ने इसे फिर से हवा दे दी।

दरअसल जानकार मानते हैं कि तीनों देशों के संगठन में तीन चीजें कॉमन हैं- ऊर्जा सुरक्षा, बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था और व्यापार। यही नहीं तीनों मुल्क आबादी और क्षेत्रफल को देखते हुए एशिया के महादेश कहे जा सकते हैं।

RIC देशों की संयुक्त GDP लगभग 54 ट्रिलियन डॉलर तक है। यह विश्व उत्पादन का करीब एक तिहाई हिस्सा है। इसके अलावा इनकी जनसंख्या दुनिया की कुल आबादी के 38 फीसदी के करीब है। करीब 3.1 अरब लोग इन तीन देशों में ही रहते हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार 4.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो वैश्विक भंडार का लगभग 38% हिस्सा है। इसके अलावा ऊर्जा की खपत भी दुनिया के एक तिहाई के बराबर है। अब बात करें तो मैन्युफैक्चरिंग में चीन, तकनीक में भारत और रक्षा एवं ऊर्जा संसाधनों में रूस की पावर मिलकर दुनिया में एक बड़ा ध्रुव बनाते हैं।

जानकार मानते हैं कि भले ही रूस, भारत और चीन के गठजोड़ की कल्पना बेहद सुनहरी है, लेकिन व्यवहारिक मुश्किलें भी उतनी ही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक राजनीतिक-सामरिक साझेदारी अभी दूर लगती है क्योंकि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद व आपसी प्रतिद्वंदिता बनी हुई हैं।