भारत की जीडीपी में जैन समाज का योगदान 24% तक है: आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज

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कोटा। रामपुरा में आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ने रविवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए अपने प्रवचन के माध्यम से धर्म, समाज, गुरु भक्ति और सच्ची भक्ति के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि हम धर्म को जीवन में उतार लें, तो यह न केवल हमें मोक्ष की ओर ले जाएगा, बल्कि समाज में भी शांति और सद्भावना लाएगा।

अध्यक्ष चेतन जैन सर्राफ ने बताया कि गुरूदेव के पादपक्षालन, चित्र अनावरण व शास्त्र भेंट के लिए लोगों में उत्साह देखा गया। सचिव विकास जैन मजित्या ने बताया कि प्रवचन में 2 हजार से अधिक लोग शामिल हुए।

प्रवक्ता अजय जैन ने बताया कि गुरु भक्ति और शिक्षाओं का पालन, जीडीपी में जैन समाज का योगदान, प्रतीक व अस्था के महत्व को समझाया। इस अवसर पर सकल समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, अध्यक्ष विमल जैन नांता, कार्याध्यक्ष जेके जैन, महामंत्री विनोद टोरडी, यतिश जैन खेडावाला, लोकेश जैन सहित कई लोग उपस्थित थे।

जैन समाज जो जनसंख्या के हिसाब से एक छोटा समुदाय है, लेकिन व्यवसाय, उद्योग और व्यापार में उनकी प्रभावशाली उपस्थिति है। आचार्य श्री ने बताया कि जैन समुदाय ने अपने नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और परिश्रम के बल पर आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में जैन समाज का योगदान 24% तक है, जो उनकी मेहनत, व्यापारिक दक्षता और ईमानदारी को दर्शाता है।

आचार्य श्री ने कहा कि जैन धर्म केवल आध्यात्मिकता तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापार और अर्थव्यवस्था में भी इसका गहरा प्रभाव है। जैन समुदाय का व्यापार में योगदान इस बात का प्रमाण है कि अहिंसा और अपरिग्रह जैसे सिद्धांत अपनाकर भी आर्थिक रूप से सफल हुआ जा सकता है।

गुरु भक्ति केवल दिखावा नहीं
गुरु भक्ति का अर्थ केवल चरण वंदना करना नहीं, बल्कि उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारना है। हर दिन 108 लोगों को “जय जिनेंद्र” कहने से हमारा मन और वाणी शुद्ध होती है। आचार्य श्री ने कहा कि गुरु की शिक्षाओं को सुनकर उनका पालन करना ही सच्ची श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है।