नई दिल्ली। ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप को टैरिफ के नाम पर धमकाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रति अपना रुख अचानक नरम कर लिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए हैं।
पिछले एक साल के अपने कार्यकाल में ट्रंप ने दुनिया में अपनी जो छवि बनाई है, उसको देखते हुए पहली नजर में यह लग सकता है कि पता नहीं, वे कल को फिर से क्या स्टैंड ले लें? लेकिन, ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि, पिछले कुछ हफ्तों में भारत को लेकर जियोपॉलिटिक्स में कुछ बड़े बदलाव के संकेत मिले हैं, जिससे ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ में जुटे ट्रंप को बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है।
स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर पूरी दुनिया को चौंका दिया कि ‘प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) के लिए मुझे बहुत ज्यादा आदर है। वह शानदार व्यक्ति और मेरे दोस्त हैं। हम अच्छा (ट्रेड) डील करने जा रहे हैं।’
यह वही ट्रंप हैं, जिन्होंने सबसे पहले 50% टैरिफ भारत पर ही लगाया, वह भी इसलिए क्योंकि हम रूस से तेल खरीद रहे हैं। लेकिन, भारत ने दो टूक कह दिया हम अपनी नीति राष्ट्रहित को देख कर तय करते हैं और किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं आएंगे। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कभी झुंझलाहट में यही ट्रंप भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ भी कह चुके हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह हृदय परिवर्तन यूं नहीं हुआ है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से उन्होंने जिस तरह से हल्केपन का परिचय दिया है, उसे पीएम मोदी ने सबसे पहले महसूस किया और उसी के हिसाब से भारत की रणनीतिक तैयारी शुरू कर दी।
इसी का परिणाम है कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में ही अमेरिका की प्राइवेट इक्विटी कंपनी कार्लाइल ग्रुप के को-फाउंडर डेविड रूबेनस्टीन ने कहा कि अगले कुछ दशकों में भारत दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी बन सकता है।
ET को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता कि मेरे जीवन काल या आपके जीवन काल में शायद मेरे कुछ समय बाद, भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा। मैं कहूंगा कि शायद 20 से 30 साल के अंदर यह हो सकता है।
अमेरिका को पता है कि अगले हफ्ते भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि (FTA) की घोषणा होने जा रही है। इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील’ यूं ही नहीं कहा जा रहा है। दुनिया की करीब 2 अरब आबादी और 25% जीडीपी इस संधि के दायरे में आने वाले हैं।
अमेरिका को मालूम है कि यूरोपियन यूनियन अगर आज भारत की ओर देख रहा है तो इसकी तेजी से बढ़ती इकॉनमी है, जो चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है। कहीं न कहीं इस संधि का दबाव ही है, जो बड़बोले ट्रंप को सुर बदलने को मजबूर कर रहा है।
खाड़ी देशों में भी भारत की बढ़ रही है पैठ
अमेरिका यह भी देख रहा होगा कि पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक दुश्मनी के बावजूद भारत का सम्मान मुस्लिम देशों में भी बढ़ रहा है। क्योंकि,रूबेनस्टीन की तरह बाकी दुनिया भी जानती है कि आने वाला भविष्य भारत का होने वाला है। अभी हाल ही में भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 2032 तक अपना व्यापार दोगुना कर 200 अरब डॉलर तक ले जाने का करार किया है। ट्रंप प्रशासन की नजरों से कोई बात बची नहीं है।
रक्षा क्षेत्र में भी बड़ी ताकत बन रहा भारत
भारत वैश्विक स्तर पर सिर्फ आर्थिक शक्ति बनकर ही नहीं उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में भी भारत की धमक के सामने दुनिया नतमस्तक होने लगी है। जो रक्षा सौदे पहले मजबूरी में होते थे, उसे आज भारत अपनी शर्तों पर कर रहा है। इसका आधार सिर्फ एक है ‘आत्मनिर्भर भारत’। यही वजह है कि भारत और यूएई ने पहली बार ‘रणनीतिक रक्षा साझेदारी’ के लिए भी हाथ मिलाया है। इसी तरह भारत और यूरोपियन यूनियन भी नई सिक्योरिटी और डिफेंस पार्टनरशिप के लिए राजी हो गए हैं, जिसपर अगले हफ्ते यूरोपियन यूनियन के नेताओं की भारत यात्रा के दौरान हस्ताक्षर होने वाले हैं।
भारत अपनी कूटनीति साधने में सफल रहा
मतलब, डोनाल्ड ट्रंप भारत पर 50% टैरिफ थोपने और बार-बार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीजफायर करवाने की रट लगाते हुए, कभी नोबेल पीस प्राइज, कभी वेनेजुएला और कभी ग्रीनलैंड हड़पने की कोशिशों में लगे रहे या फिर ईरान को धमकाने में मस्त रह गए। वहीं पीएम मोदी की अगुवाई में भारत बदलती जियोपॉलिटिक्स के हिसाब से दुनिया भर की शक्तियों के साथ कूटनीतिक चर्चा में जुटा रहा, जिसका अच्छा परिणाम सामने आने लगा है और अमेरिका को एक तरह से इसके सामने घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा है।

