नई दिल्ली। india china trade: अब भारत में सिर्फ आईफोन ही नहीं बन रहे हैं। स्मार्ट टीवी और माइक्रोवेव ओवन भी यहीं बन रहे हैं। इसके साथ ही, कुछ खास इलेक्ट्रॉनिक चीजें भी अब भारत में बनने लगी हैं।
ये वो चीजें हैं जो पहले पूरी तरह से बाहर से मंगाई जाती थीं। जैसे कि रोबोट वाले वैक्यूम क्लीनर, कॉफी बनाने की मशीन, बिल्ट-इन रेफ्रिजरेटर और एयर फ्रायर। इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक चीजों की लिस्ट बढ़ा दी है। अब इन चीजों को बनाने वाली फैक्ट्रियों को BIS से सर्टिफिकेट लेना होगा।
BIS के क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) का मतलब है कि चीन और दूसरी जगहों से आने वाले सामान पर कंट्रोल किया जा सके और भारत में ही प्रोडक्शन को बढ़ावा मिले। ज्यादातर ये खास चीजें पिछले आठ-नौ महीनों में QCO के दायरे में आई हैं। पहले, ज्यादातर कंपनियां कहती थीं कि इन चीजों का मार्केट इतना छोटा है कि इन्हें भारत में बनाना फायदे का सौदा नहीं है।
डिक्सन टेक्नोलॉजीज के मैनेजिंग डायरेक्टर अतुल लाला का कहना है, “BIS के नियमों ने एक बड़ा बदलाव लाया है। अब प्रीमियम ब्रांड भी छोटे उपकरणों को भारत में बनाने के बारे में सोच रहे हैं, भले ही मार्केट छोटा हो। यह एक अच्छा बिजनस करने का मौका है।” हाल ही में, डिक्सन ने यूरेका फोर्ब्स के साथ रोबोट वैक्यूम क्लीनर बनाने का समझौता किया है। इस कैटेगरी का मार्केट सिर्फ 700 करोड़ रुपये का है।
डिक्सन भारत की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनी है। यूरोप की Liebherr कंपनी ने औरंगाबाद में बिल्ट-इन रेफ्रिजरेटर बनाने का प्लांट लगाया है। अप्रैल से यहां प्रोडक्शन शुरू हो गया है जबकि भारत में इसकी सालाना बिक्री सिर्फ 14,000-15,000 यूनिट्स ही है।
Liebherr Appliances के इंडिया मैनेजिंग डायरेक्टर (सेल्स) कपिल अग्रवाल ने कहा कि इस साल से रेफ्रिजरेटर के लिए BIS के नियम लागू होने से उन्हें भारत में फैक्ट्री लगाने का ख्याल आया। इसके साथ ही लोग अब महंगी चीजें ज्यादा पसंद कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम जर्मनी से इम्पोर्ट कर रहे थे लेकिन फैक्ट्री को सर्टिफाई कराना बहुत मुश्किल काम है। हमें यह भी लगता है कि मार्केट पांच साल में 1 लाख यूनिट्स तक बढ़ जाएगा। इसलिए भारत में प्लांट लगाने से बिजनस अच्छा चलेगा और इम्पोर्ट करने में लगने वाला समय भी कम हो जाएगा।”
Crompton Greaves Consumer Electricals ने अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है कि वे इस साल भारत में ही सामान बनाने को प्राथमिकता देंगे। Havells India ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वे इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए भारत में ही प्रोडक्शन को बढ़ावा देंगे। पिछले साल तक वे 15% सामान बाहर से मंगाते थे, जिसे उन्होंने घटाकर 8% कर दिया है।
कितना बड़ा है मार्केट
कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर Epack Durable के MD अजय सिंघानिया का कहना है कि QCO लागू होने से अब और भी अच्छी कैटगरी खुल गई हैं। मिक्सर ग्राइंडर जैसी चीजों का बिजनेस या तो स्थिर है या सिर्फ 3-4% की दर से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि एयर फ्रायर, इलेक्ट्रिक केतली और हेयर ड्रायर जैसी 72 कैटगरी में मौका है, जो पहले पूरी तरह से इम्पोर्ट की जाती थीं। उन्होंने पिछले महीने एनालिस्ट्स को बताया, “हम इन कैटगरी को भारत में बनाने में आगे बढ़ रहे हैं और ज्यादातर बड़ी कंपनियों की जरूरतें पूरी कर रहे हैं।”
कुछ कंपनियों ने QCO लागू होने से पहले ही इन चीजों को बड़ी मात्रा में इम्पोर्ट कर लिया था। इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि भले ही एक-एक कैटगरी का मार्केट छोटा हो, लेकिन कुल मिलाकर यह 12,000-13,000 करोड़ रुपये का बिजनस है। अगर तुलना करें तो सिर्फ एयर कंडीशनर का मार्केट 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है और स्मार्टफोन का मार्केट 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है।

