भगवान उसे ही देता है जो पुण्य के क्षेत्र में निवेश करता है: प्रज्ञासागर मुनिराज

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कोटा। जैनाचार्य प्रज्ञासागर जी मुनिराज का 37वां चातुर्मास महावीर नगर प्रथम स्थित प्रज्ञालोक में जारी है। शनिवार को मुनिराज ने अपने दिव्य प्रवचन में दान, पात्रता और पुण्य के गूढ़ सिद्धांतों को सहज और व्यावहारिक उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि यदि आप मंदिर में अपनी जेब से केवल 1 रुपया दान करते हैं और बाकी पैसा अपने पास रखते हैं, तो यह मानना चाहिए कि वही एक रुपया आपके पुण्य का वास्तविक धन था, जो मंदिर की दानपेटी में गया।

गुरुदेव ने कहा कि भगवान उसे ही देता है जो पुण्य के क्षेत्र में निवेश करता है। जो केवल संचय करता है, उसे ईश्वर नहीं देता। कुंदकुंद स्वामी की ‘रयणसार’ की गाथा-17 को आधार बनाकर उन्होंने बताया कि जैसे भारत का रुपया अमेरिका में नहीं चलता, उसे डॉलर में बदलना पड़ता है, ठीक वैसे ही जब आपका पैसा दान में जाता है, तो वह ‘स्वर्ग की मुद्रा’ में बदल जाता है।

उन्होंने विशेष रूप से दान के पात्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दान केवल भावना से नहीं, विवेक से किया जाना चाहिए। सही पात्र को दान देना ही सच्चा पुण्य है। उन्होंने बताया कि दान के पांच प्रकार के पात्र होते हैं। उत्तम पात्र, मध्य पात्र, जघन्य पात्र, कुपात्र व अपात्र। कुपात्र और अपात्र को दिया गया दान निष्फल होता है, जैसे रबी के मौसम में खरीफ की फसल नहीं उगाई जा सकती।

दिगंबर मुनि आहार दान के लिए सबसे श्रेष्ठ पात्र होते हैं। क्योंकि वे तपस्या में स्थित रहते हैं और संसारिक लालसाओं से पूर्णतः मुक्त होते हैं। जो मुनियों को आहार दान देता है, वह नरकगति से बचता है और जो तीर्थंकर को आहार देता है, वह भवसागर को पार कर जाता है।