सवाई माधोपुर। प्रदेश के सबसे बड़े रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की लगातार बढ़ती संख्या अब वन प्रशासन के लिए चुनौती बनती जा रही है। बाघों के लिए पर्याप्त टेरेटरी (क्षेत्र) नहीं होने के कारण वे जंगल से बाहर निकलकर आसपास के गांवों की आबादी तक पहुंच रहे हैं।
इससे जहां वन विभाग को परेशानी हो रही है, वहीं स्थानीय लोगों में भी डर का माहौल बना हुआ है। इस समस्या के समाधान के लिए वन विभाग अब बाघों के लिए नई जगह तलाश रहा है।
रणथंभौर टाइगर रिजर्व में इस समय करीब 76 बाघ, बाघिन और शावक मौजूद हैं। जबकि साल 2016 में वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के सर्वे के अनुसार यहां सिर्फ 45 से 55 बाघ ही रह सकते हैं। ऐसे में मौजूदा संख्या क्षमता से काफी ज्यादा हो गई है। यही कारण है कि बाघ अपनी टेरेटरी की तलाश में जंगल से बाहर निकलकर आबादी क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार युवा और ताकतवर बाघों के दबाव के कारण कमजोर और वृद्ध बाघ अपनी टेरेटरी छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं और नई जगह की तलाश में जंगल से बाहर निकल जाते हैं। वन अधिकारी भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि रणथंभौर में बाघों की संख्या क्षमता से अधिक है और उन्हें अतिरिक्त जगह की जरूरत है।
रणथंभौर के बाघों को पर्याप्त स्थान देने के लिए वन विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। एक ओर जहां नया ग्रासलैंड, कैलादेवी कॉरिडोर और रामगढ़ विषधारी कॉरिडोर विकसित किए जा रहे हैं, वहीं अब एक नया सफारी पार्क बनाने की योजना भी तैयार की गई है।
वन विभाग रणथंभौर से सटी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) की जमीन पर नया सफारी पार्क विकसित करना चाहता है। इस जमीन पर बना आईओसी प्लांट पिछले 23-24 वर्षों से बंद पड़ा है और यहां पर्याप्त प्राकृतिक जंगल भी मौजूद है। वन विभाग का मानना है कि यदि यह जमीन मिल जाती है, तो यहां बड़ा एनक्लोजर बनाकर कमजोर, वृद्ध और घायल बाघों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह का कहना है कि कोटा के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व की तरह बड़ा एनक्लोजर यहां भी बनाया जा सकता है, जो एक बाघ की सामान्य टेरेटरी से भी बड़ा हो। उन्होंने बताया कि इस योजना को लेकर स्थानीय विधायक और प्रदेश के कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के माध्यम से केंद्र सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा गया है।
अगर यह सफारी पार्क बनता है तो रणथंभौर आने वाले पर्यटकों को भी फायदा होगा। कई बार टिकट नहीं मिलने के कारण पर्यटक टाइगर सफारी नहीं कर पाते। ऐसे में यह नया सफारी पार्क उनके लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। साथ ही इससे सरकार को भी राजस्व प्राप्त होगा।
इस सफारी पार्क के बनने से बाघों के बीच टेरेटरी को लेकर होने वाले संघर्ष में कमी आएगी। साथ ही बाघों का जंगल से निकलकर गांवों में आने का सिलसिला भी कम हो सकेगा। इससे वन विभाग की निगरानी में भी आसानी होगी और ग्रामीणों में फैला डर भी कम होगा।
केंद्र सरकार के फैसले का इंतजार
वन विभाग ने अपना प्रस्ताव तैयार कर भेज दिया है। अब जरूरत है कि राज्य सरकार केंद्र सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय से संपर्क कर आईओसी की जमीन को रणथंभौर टाइगर रिजर्व के नाम ट्रांसफर करवाए। यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो रणथंभौर के बाघों को नई जगह मिलेगी और मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में कमी आ सकेगी।

