कोटा। जैनाचार्य प्रज्ञासागर मुनिराज ने महावीर नगर प्रथम स्थित प्रज्ञालोक में चल रहे चातुर्मास के दौरान सोमवार को अपने प्रवचनों में आचार्य कुंदकुंद स्वामी की देशना का हवाला देते हुए श्रावकों को आत्मनिरीक्षण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति श्रावक होते हुए भी दान, धर्म, त्याग और न्यायपूर्वक भोग नहीं करता है, तो वह ‘बर्हि आत्मा’ है। यानी केवल बाह्य जीवन जी रहा है, उसका अंतरात्मा से कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए। दान करने से धन घटता नहीं, बल्कि पुण्य बढ़ता है। यदि कोई अपनी सामर्थ्य के बावजूद दान नहीं करता, तो वह स्वयं से ही छल कर रहा होता है। प्रज्ञासागर महाराज ने कहा कि आज के समय में धन कमाने की प्रक्रिया में अनजाने में कुछ पापकर्म भी हो सकते हैं। ऐसे में दान एक प्रकार से उसका प्रायश्चित बन सकता है। उन्होंने आहार, अभय, औषधि और पैसे के दान का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें सबसे श्रेष्ठ दान आहार दान है, क्योंकि यह तुरंत किसी की तृप्ति का माध्यम बनता है।
रयणसार की 18वीं गाथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि बर्हि आत्मा उस पतंगे की तरह है जो लोभ और कषाय रूपी मोमबत्ती की लौ में जलकर नष्ट हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार सुबह से कुएं से पानी निकालने के बाद भी वह रात तक फिर भर जाता है, उसी तरह दान करने से धन की कमी नहीं आती, वह पुनः बढ़ता है।”दो हाथों से कमाओ, और सौ हाथों से दान करो”यह न केवल आत्मकल्याण का मार्ग है, बल्कि समाज के कल्याण की दिशा में भी एक सशक्त कदम है।

