कोटा। गणिनी आर्यिका विशुद्धमति माताजी ससंघ का तलवण्डी स्थित जैन मंदिर में शीतकालीन प्रवास चल रहा है। शीतकालीन देशना में पट्ट गणिनी आर्यिका विज्ञ मति माताजी ने अपने प्रवचन के दौरान कहा कि आत्मा के दर्शन-गुण को ढकने वाला कर्म ‘दर्शनावरणी कर्म’ कहलाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति किसी भी तत्व का यथार्थ अवलोकन नहीं कर पाता, क्योंकि उसकी दर्शन-शक्ति पर आवरण पड़ जाता है।
उन्होंने बताया कि जब कोई जीव दूसरों के दर्शन, ज्ञान अथवा अनुभूतियों में बाधा उत्पन्न करता है, तब वह इस प्रकार के कर्म का बंध करता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसकी स्वयं की आत्मिक क्षमता भी सीमित हो जाती है और वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने में असमर्थ रहता है।
गणिनी माताजी ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे किसी के भी कार्यों में विघ्न डालने के बजाय सहयोग और सद्भाव की भावना अपनाएं। विशेषकर धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों, जैसे मंदिर निर्माण और सेवा कार्यों में बाधक बनने के स्थान पर सहभागी बनकर सहयोग देना आत्मिक उन्नति और सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक है। धर्मसभा में अध्यक्ष अशोक पहाडिया, महामंत्री प्रकाश सामरिया, जेके जैन, राजकुमार लुहाडिया सहित कई श्रावक उपस्थित रहे।

