जैन धर्मशास्त्रों की व्याख्या से श्रद्धालुओं को मिला आत्मबोध का संदेश

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कोटा। विज्ञान नगर स्थित दिगंबर जैन मंदिर में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी एवं विनयश्री माताजी (ससंघ) के सान्निध्य में चल रहे चातुर्मास गुरुवार को भी जारी रहा। इस अवसर पर विभाश्री माताजी ने जैन दर्शन के महान ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र पर आधारित विशेष प्रवचन में आध्यात्मिक ज्ञान की अमूल्य धारा प्रवाहित हुई।

आचार्य भगवान उमास्वामी द्वारा रचित इस ग्रंथ के गूढ़ रहस्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया। प्रवचन में बताया गया कि तत्वार्थ सूत्र के तेरहवें अध्याय में तीनों लोकों ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक एवं अधोलोक की सरंचना का सुस्पष्ट वर्णन मिलता है।

प्रवचनकर्ता ने बताया कि ऊर्ध्वलोक में देवगणों का वास है, मध्यलोक में मनुष्यों एवं जीवों का निवास होता है, जबकि अधोलोक में नरकों का विस्तार बताया गया है। तेरहवें अध्याय में जैन भूगोल का गहन वर्णन किया गया है, जिससे श्रोताओं को जीवन के विविध आयामों की विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई।

इस अवसर पर आर्यिका विभाश्री माताजी ने भक्तामर स्तोत्र के गूढ़ रहस्यों पर आधारित प्रवचन में एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि एक नेत्रहीन व्यक्ति प्रतिदिन भगवान के दर्शन करने आता था। जब उससे किसी ने पूछा कि वह बिना देखे दर्शन कैसे करता है, तो उसने भावुकता से उत्तर दिया, “मैं अंधा हूँ, परंतु भगवान तो मुझे देख सकते हैं। उनके सामने उपस्थित होना ही मेरे लिए पुण्यदायी है।”

माताजी ने समझाया कि जब भक्त भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा रखता है, तो उसका प्रत्येक क्षण दिव्य बन जाता है। उन्होंने कहा, “भगवान आपके प्रभाव से मेरा स्तवन सज्जनों के चित्त को हरने वाला बन जाए। जो भगवान की भक्ति नियमित करता है, वह कभी भी पीछे नहीं हटता और निरंतर आध्यात्मिक प्रगति करता है।”