कोटा। जैनाचार्य प्रज्ञासागर मुनिराज ने महावीर नगर प्रथम स्थित प्रज्ञालोक में चल रहे चातुर्मास के दौरान मंगलवार को अपने प्रवचन में कहा कि जो व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है, वह अपना रास्ता स्वयं बना लेता है। इसके लिए केवल सामर्थ्य ही नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और जूनून आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बरगद के नीचे पौधे बड़े नहीं बन पाते, लेकिन बेल का पौधा एक पेड़ को लिपटकर उसकी शाखाओं से भी ऊपर निकल जाता है। यदि आपके भीतर संकल्प शक्ति है, तो आप असंभव को भी संभव बना सकते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में रुकना नहीं चाहिए। यदि थक जाएं तो बैठकर चलें, आगे न बढ़ सकें तो लेटकर भी आगे बढ़ते रहें, परन्तु चलना बंद न करें। क्योंकि यदि आप ठहर गए, तो समय आपसे आगे निकल जाएगा।
आत्मा और परमात्मा का मिलन भी उसी व्यक्ति को संभव है, जिसमें साधना का जूनून हो। कई लोग सामर्थ्य होने पर भी निष्क्रिय बने रहते हैं, जबकि कई अक्षम व्यक्ति भी अपनी लगन और जुनून से खिलाड़ी बनकर उभर आते हैं।
उदाहरण देते हुए उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी ऋषभ पंत का उल्लेख किया। दुर्घटना के बाद विशेषज्ञों ने कहा था कि शायद वह मैदान में कभी लौट न सके, लेकिन अपनी इच्छाशक्ति और संकल्प के बल पर उन्होंने न केवल वापसी की बल्कि उत्कृष्ट प्रदर्शन कर उपकप्तान का स्थान भी हासिल किया।
आचार्य श्री ने कहा कि गुरु का कार्य शिष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है। जैसे महंगी गाड़ी भी हवा के बिना नहीं चल सकती, वैसे ही गुरु का दायित्व है जीवन के चारों पहियों में सही ऊर्जा भरना।
उन्होंने आगे कहा कि धार्मिक कार्यों में कभी विघ्न नहीं डालना चाहिए। यदि कोई विघ्न डालता है तो उसका पाप अवश्य मिलता है। वहीं अच्छे कार्य की सराहना करना या दान के लिए प्रोत्साहित करना महान पुण्य का कारण बनता है। दान देना पुण्य है और दूसरों को प्रेरित करना महापुण्य है।

