कोटा। गुरु आस्था परिवार कोटा के तत्वावधान में सकल दिगंबर जैन समाज कोटा के आमंत्रण पर प्रज्ञालोक महावीर नगर प्रथम में चल रहे चातुर्मास में जैनाचार्य प्रज्ञासागर महाराज गुरुवार को अपने प्रवचन में कहा कि दीपावली का आगमन होते ही वर्षायोग का समापन हो जाएगा।
जैसे ग्रंथों में वर्णित घटनाएं समय से पूर्व ही दृष्टिगोचर होती हैं, वैसे ही संसार की अनेक वस्तुएं समाप्त होती दिखती हैं, किंतु मनुष्य यह नहीं देख पाता कि उसका अपना जीवन भी क्षीण हो रहा है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने को अजर-अमर मानकर बैठा है, यही सोच उसे कर्म, साधना और आत्मकल्याण से दूर कर देती है। उसे लगता है कि उसके पास बहुत समय है, जबकि केवल समय ही जानता है कि कितना समय शेष है। जीवन रेत की तरह फिसलता जा रहा है, दीपक का तेल समाप्त हो रहा है।
आचार्य श्री ने उपमा देते हुए कहा कि “जब मोबाइल में केवल 2 प्रतिशत बैटरी शेष रह जाती है और चार्ज करने की सुविधा नहीं होती, तो समझदार व्यक्ति इंटरनेट बंद कर देता है। उसी प्रकार जब जीवन का समय अल्प रह जाए तो संसार के जाल से हटकर आत्मकल्याण में लग जाना चाहिए। अन्यथा, जीवन रूपी मोबाइल किसी भी क्षण बंद हो सकता है।”
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य ‘परिचय, परिग्रह और परिवार’ के नेटवर्क से बाहर नहीं आएगा, तब तक वह मोक्षमार्ग पर नहीं चल सकेगा। जो दृश्य पदार्थ हैं, उनकी समाप्ति तो सबको दिखती है, पर एक-एक सांस जो जीवन घटा रही है, उस पर किसी का ध्यान नहीं। “हर आती सांस जीवन है और जाती सांस मृत्यु है। समय का भरोसा किसी के पास नहीं,”।
आचार्य श्री ने कहा कि मोबाइल की बैटरी चार्ज होकर पुनः चल सकती है, पर जीवन की बैटरी का कोई चार्जर नहीं। आज मनुष्य वस्तुओं का मूल्य जानता है, किंतु अपने जीवन का मूल्य नहीं समझता। पहले लोग अपने ‘स्व’ की कीमत समझते थे, तभी पुरुष से महापुरुष बनते थे।
उन्होंने कहा “जीवन अनमोल है। जीवन से दुनिया खरीदी जा सकती है, पर दुनिया से जीवन नहीं खरीदा जा सकता। इसलिए जीवन की शेष सांसों को आत्मकल्याण में लगाना ही सबसे बड़ा विवेक है।”

