नई दिल्ली। चीन और वेनेजुएला के बीच तेल और पैसे का सौदा अब मुश्किल में पड़ गया है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के सत्ता से हटने के बाद इस साझेदारी का भविष्य अनिश्चित है। 2000 के दशक की शुरुआत में चीन को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए तेल की सख्त जरूरत थी। वेनेजुएला को पैसों की।
उस समय वेनेजुएला के नेता ह्यूगो शावेज अमेरिका से अपनी आर्थिक निर्भरता कम करना चाहते थे। इसी मौके पर चीन और वेनेजुएला ने एक बड़ा व्यापार समझौता किया। चीन ने वेनेजुएला को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज देने का वादा किया। बदले में वेनेजुएला चीन को तेल देने लगा।
इस चीनी पैसे से वेनेजुएला में रेलवे और बिजली घर बने और देश को जरूरी नकदी मिली। वेनेजुएला ने इस पैसे को तेल के जरिए चुकाने का वादा किया। यह सौदा आज भी जारी है। लेकिन, हालात मुश्किल हैं। वेनेजुएला ने बीजिंग का कर्ज चुकाने की कोशिश की है। अब भी करीब 10 अरब डॉलर का कर्ज बाकी है।
वेनेजुएला में भारत का भी लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 9,000 करोड़ रुपये) बकाया फंसा हुआ है। यह मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) का डिविडेंड है, जो वेनेजुएला के ‘सैन क्रिस्टोबल’ तेल क्षेत्र में उसकी 40% हिस्सेदारी से जुड़ा है।
इसमें से लगभग 53.6 करोड़ डॉलर साल 2014 तक का बकाया है, जबकि इतनी ही राशि बाद के वर्षों की है जिसका ऑडिट वेनेजुएला ने अब तक नहीं होने दिया। साल 2020 में अमेरिका की ओर से लगाए गए कड़े प्रतिबंधों और वहां के अस्थिर राजनीतिक हालातों के कारण यह भुगतान और तेल का उत्पादन लंबे समय से रुका हुआ है।
चीन ने भी वेनेजुएला को नए कर्ज देना बंद कर दिया है। अब वह वेनेजुएला और तेल पर उतना निर्भर नहीं रहा। अमेरिका ने वेनेजुएला पर कई सालों से कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं। हाल ही में अमेरिकी सेना ने मादुरो को गिरफ्तार कर लिया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका वेनेजुएला के तेल उद्योग को अपने कब्जे में लेने को तैयार है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिकी सेना उन तेल टैंकरों को वेनेजुएला में आने-जाने से रोकेगी जो अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में हैं, जब तक कि वेनेजुएला की सरकार इस सरकारी उद्योग को विदेशी निवेश के लिए नहीं खोल देती। इससे अमेरिका को बहुत फायदा होगा।
2017 में जब अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल पर कड़े प्रतिबंध लगाए और वेनेजुएला अपने सरकारी बॉन्ड पर डिफॉल्ट कर गया, तब से बीजिंग के लिए अपना पैसा वापस पाना मुश्किल हो गया था। उस समय वेनेजुएला पर चीन का 44 अरब डॉलर का कर्ज था।
देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई थी, हिंसा और गरीबी फैली हुई थी और लाखों वेनेजुएलावासी देश छोड़कर भाग गए थे। हाल के महीनों में अमेरिकी सेना ने तेल टैंकरों पर हमला करके और वेनेजुएला के बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों की नाकाबंदी करके स्थिति को और भी मुश्किल बना दिया है।
AidData के कार्यकारी निदेशक ब्रैड पार्क्स के अनुसार, ‘इस कर्ज समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि आपको मूल समझौते में तेल की मात्रा पर सहमत होना पड़ता है।’ AidData ने 2000 से अब तक चीन की ओर से वेनेजुएला को कुल 106 अरब डॉलर का कर्ज देने की गणना की है। 2017 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने बीजिंग के लिए चीजों को और जटिल बना दिया। पार्क्स ने कहा, ‘इसका वेनेजुएला की अपने चीनी लेनदारों के प्रति कर्ज चुकाने की क्षमता पर असर पड़ा है।’
चीन के तेल की खपत के तरीके में भी भारी बदलाव आया है। देश अभी भी जीवाश्म ईंधन का एक बड़ा उपभोक्ता है। लेकिन, उसने इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा के विकास में अरबों डॉलर का निवेश किया है।
यह संभव है कि ट्रंप का वेनेजुएला के तेल क्षेत्र को दोबारा जिंदा करने का प्रयास चीन को उसका पैसा वापस पाने में मदद करे, भले ही अमेरिका का लैटिन अमेरिका में अधिक हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण बीजिंग के लिए एक बड़ी समस्या खड़ी कर दे।

