गुरु उपकार दिवस के रूप में मनाई गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी की दीक्षा जयंती

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संतों के चरणों से भूमि होती है धर्ममय: लोकसभा अध्यक्ष

कोटा। आरकेपुरम स्थित मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर, त्रिकाल चौबीसी परिसर के तत्वावधान में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी एवं आर्यिका विनयश्री माताजी के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने गहन आस्था एवं श्रद्धा के साथ अर्घ्य अर्पित किए। गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी के 32वें दीक्षा जयंती महोत्सव आध्यात्मिक गरिमा और भक्ति भाव के साथ मनाया गया।

मंदिर अध्यक्ष अंकित जैन ने बताया कि प्रातः 9 बजे दीक्षा जयंती महोत्सव का विधिवत शुभारंभ हुआ। सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं पूजन के उपरांत आचार्य विराग सागर जी महाराज एवं गुरुमाता पूजन, पिच्छी परिवर्तन तथा वस्त्र भेंट समारोह संपन्न हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में भाजपा जिलाध्यक्ष राकेश जैन मडिया उपस्थित रहे।
समिति उपाध्यक्ष लोकेश जैन बरमुंडा ने बताया कि दीक्षा जयंती समारोह में पादप्रक्षालन का सौभाग्य पवन एवं पलाश जैन परिवार को प्राप्त हुआ।

नवीन पिच्छी भेंट, चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन का सौभाग्य मनोज–नेहा जैसवाल को मिला। शास्त्र भेंट एवं पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य अशोक एवं संजय सांवला परिवार को प्राप्त हुआ। समोशरण में श्रावकों ने भक्ति गीतों—“सुनो गुरुमां हम आपको हृदय में बसाकर रखूंगी”, “गुरुमां के हम दीवाने, दीक्षा दिवस आए मनाने”—के साथ दीक्षा जयंती महोत्सव मनाया।

धर्मसभा में सकल समाज के पदाधिकारियों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का सम्मान किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ओम बिरला ने कहा कि गुरु उपकार दिवस आत्ममंथन का अवसर है। उन्होंने कहा कि गुरुमां ने 32 वर्षों के तप, संयम और साधना से समाज को नई दिशा दी है। जब साधु-संतों के चरण धरती पर पड़ते हैं तो वह भूमि धर्ममय हो जाती है। उनका वात्सल्य, स्नेह, आशीर्वाद और करुणा ही भगवान महावीर के बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

दीक्षा लेना परम सौभाग्य का अवसर
अपने प्रवचन में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने गुरु आचार्य विराग सागर महाराज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि दीक्षा लेना परम सौभाग्य का अवसर है। उन्होने दीक्षा दिवस का स्मरण मोक्ष भावना को जागृत करता है और श्रावकों को आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर करता है। तप, संयम और साधना से ही जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है।