वॉशिंगटन/नई दिल्ली। एक खेमे की आलोचना और दूसरे खेमे में चल रहे जश्न के बीच अमेरिकी ट्रेड डील पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी है। ऐसा इसलिए क्योंकि असल में भारत और अमेरिका के बीच का ट्रेड डील अभी तक बनकर तैयार ही नहीं हुआ है।
पिछले हफ्ते रेसिप्रोकल ट्रेड पर एक अंतरिम एग्रीमेंट के लिए फ्रेमवर्क की घोषणा की गई, जिसके तहत उस प्रोसेस पर चला जाएगा। जबकि मोदी सरकार का मकसद इंडियन इकॉनमी को बढ़ाना और उस असहनीय बोझ को कम करना होना चाहिए, जिसे 50 प्रतिशत टैरिफ के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद लागू किया था।
इसीलिए भारत के लिए ये सवाल पूछना जरूरी है कि क्या यह भविष्य में भारत और अमेरिका के बीच होने वाले किसी भी दूसरे एग्रीमेंट में भी, चाहे वो रणनीतिक हों, या आर्थिक या फिर रक्षा से जुड़े हों, क्या उनके भी अमेरिका ट्रेड डील की तरह ही समझौते करेगा?
ट्रंप प्रशासन ने अभी तक इस डील पर हर घोषणा एकतरफा ही की है। ट्रंप ने दावा किया है कि भारत ने उससे वादा किया है कि रूसी तेल नहीं खरीदा जाएगा। ट्रंप ने धमकी भी दी है कि अगर भारत ने रूसी तेल खरीदा तो 25 प्रतिशत टैरिफ वापस आ जाएगा।
ट्रंप ने 6 फरवरी को जिस एग्जक्यूटिव ऑर्डर पर दस्तखत किए हैं, उनमें इसी बात का जिक्र किया गया है। इसमें ये भी कहा गया है कि भारत, अमेरिका से बहुत ज्यादा सामान खरीदेगा।
इसके अलावा भारत, भारतीय सामानों पर 18% अमेरिकी टैरिफ के बदले में अमेरिका के खिलाफ टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर को “जीरो” कर देगा। जबकि मोदी ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर के सामान खरीदने का भी वादा किया है।
विदेश नीति पर US के साथ एलाइन करेगा भारत
प्रधानमंत्री मोदी ने एक पोस्ट करते हुए अमेरिका से ट्रेड डील होने के लिए देशवासियों को बधाई दी और कहा कि टैरिफ कम किए जाएंगे। इसके चार दिन बाद (अमेरिकी समय के मुताबिक सुबह 4 बजे), वॉशिंगटन ने रूस और ईरान पर संयुक्त बयान और दो एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी किए और उसके बाद एक “फैक्ट शीट” भी जारी की। प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने कुछ घंटों बाद ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी किया। सरकार ने तब से अपने सार्वजनिक बयानों में दूसरे डॉक्यूमेंट्स पर बात करने से मना कर दिया है। लेकिन एकतरफा ‘ज्वाइंट स्टेटमेंट’ लाने का पूरा तरीका यह सवाल खड़ा करता है। फैसले कौन ले रहा है?
अमेरिका ने साफ किया है कि उसने भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ को तीन समझौतों के तहत रद्द कर दिया और अगर भारत ने रूसी तेल सप्लाई फिर से शुरू की तो US फिर से टैरिफ लगाएगा। भारत, रूस से तेल खरीद रहा है या नहीं, इसपर नजर रखने के लिए ट्रंप ने टॉप अधिकारियों का एक पैनल भी बना दिया है।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, शायद इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि ऑर्डर में कहा गया है कि “भारत राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आर्थिक मामलों को लेकर यूनाइटेड स्टेट्स के साथ काफी हद तक अलाइन होने” के लिए सहमत हो गया है। ये काफी हैरान करने वाले दावे हैं।
अमेरिकी दावों को खारिज क्यों नहीं करता है भारत
भारत सरकार ने अब तक इनमें से किसी भी दावे से इनकार नहीं किया है, बल्कि भारत की एनर्जी सोर्सिंग प्रायोरिटी और अपने सप्लाई सोर्स को डायवर्सिफाई करने की जरूरत को बताते हुए लंबे बयान जारी किए हैं। वहीं, जमीनी स्तर पर दिख रहा है कि नवंबर 2025 से भारत का रूसी तेल खरीदना कम होने लगा है। दिसंबर 2025 में तेल की खरीद 38 महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गई। 2024 में अपने तेल इनटेक के 40% से दिसंबर 2025 में रूस का हिस्सा 25% हो गया है। इसके अलावा अगर अमेरिका से इतना ज्यादा सामान भी खरीदा जाएगा तो फिर दूसरे देशों से खरीददारी जाहिर तौर पर होगी, तो फिर भारत के ‘विविधता’ लाने वाली बातों का क्या होगा?
अमेरिका से भारत को क्यों पूछने ही पड़ेंगे कुछ सख्त सवाल?
- अमेरिका से कारोबार करने का एकमात्र तरीका अगर टैरिफ हो तो फिर अमेरिका के साथ स्ट्रैटजिक रिश्तों का क्या मतलब है?
- क्या डिफेंस डील, मिलिट्री अलाइनमेंट, QUAD और इंडो-पैसिफिक, काउंटर-टेररिज्म और भारत के पड़ोस सहित स्ट्रेटेजिक रिश्तों पर अमेरिका के साथ हर समझौता इसी पैटर्न पर आधिरित होगा?
- पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ अमेरिका के डील और डील करने के तरीके ने साफ दिखाया है कि वॉशिंगटन को नई दिल्ली से रिश्तों की कोई खास परवाह भी नहीं है।
- अमेरिका ने भारत को चाबहार से हटने, रूसी तेल खरीदना बंद करने, ईरान से कारोबार बंद करने के लिए मजबूर किया है।
जबकि सिर्फ भारत ही वो इकलौता देश है, जिसपर अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया था। उसने चीन और तुर्की जैसे देशों को छुआ भी नहीं। इसीलिए भारत को आकलन करने की जरूरत है कि अमेरिका के साथ ऐसे रिश्ते में रहने का क्या मतलब है? या फिर डोनाल्ड ट्रंप जो कहेंगे, उसे मानते रहना होगा और भारत क्या, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का अब खत्म होने का इंतजार करेगा?

