कीमती वस्तु का महत्व समय के साथ कम नहीं होता: विज्ञमति माताजी

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धर्ममय वातावरण में सम्पन्न हुआ विशुद्धमति माताजी की 77 वर्षों की तप-साधना का उत्सव

कोटा। सर्वाधिक दीक्षा प्रदात्री गुरु माँ गणिनी आर्यिका विशुद्धमति माताजी के 77वें अवतरण दिवस महोत्सव के दूसरे दिन भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया गया। गुरूमां सहित 25 पिच्छीका एक साथ शोभायात्रा में शामिल रही।

गणिनी आर्यिका विशुद्धमति माताजी के साथ ब्रह्मविद्या वाचस्पति, प्रज्ञा पद्मिनी करुणामूर्ति पट्टगणिनी आर्यिकारत्न विज्ञमति माताजी ससंघ तथा परम पूज्य गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी एवं विनयश्री माताजी (ससंघ) के पावन ससंघ शोभायात्रा मे साथ रही।

शोभायात्रा तलवंडी जैन मंदिर से प्रारंभ होकर जवाहर नगर स्थित एलन परिसर में पहुंची। महिलाएं लाल व पीली साडी व पुरूष श्वेत कपडे में जिनधर्म की पताका हाथ में लिए गुरूमां की जयकारो के साथ आगे बढ़ रहे थे।

इस अवसर पर गणिनी आर्यिका विभाश्री गुरु मां ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि वैद्य, वकील और साधु जितने अधिक पुराने होते हैं, उतने ही अधिक अनुभवी, परिपक्व और समाज के लिए उपयोगी बनते हैं। अनुभव ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।

77 वर्षों के तप, साधना और अनुभव से संघ का कुशल संचालन कर रहीं विशुद्धमति माताजी ने कहा कि पंचमकाल में संघ का संचालन करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इसे वही समझ सकता है, जो इस उत्तरदायित्व को पूरी निष्ठा और संयम के साथ निभा रहा हो।

माताजी ने भावुक शब्दों में कहा कि एक-एक कर 77 वर्ष का समय बीत गया। हम जीवन में एक-दूसरे से इस प्रकार मिलें कि जब भगवान से मिलन हो, तो वह मिलन पूर्णता को प्राप्त करे। विज्ञमति माताजी एवं विनयश्री माताजी ने अपनी विनयांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कीमती वस्तु का महत्व समय के साथ कम नहीं होता। जैसे कटी या मुड़ी हुई मुद्रा भी अपना मूल्य बनाए रखती है, उसी प्रकार गुरु मां का महत्व और प्रभाव भी सदैव अक्षुण्ण रहता है।