ईरान से लड़कर अमेरिका हार की कगार पर, निकम्मे दूतों ने ट्रंप को किया फेल, जानें कैसे

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तेहरान/वॉशिंगटन। ईरान के सामने डोनाल्ड ट्रंप का शांति प्रस्ताव ताश के पत्तों की तरह बिखर गया है। उनके दोनों दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ की जोड़ी बुरी तरह से नाकाम हो गई है।

ये दोनों एक तरह से ब्रोकर हैं जो अलग अलग देशों में डोनाल्ड ट्रंप के लिए सौदे करते हैं जिनमें पाकिस्तान भी शामिल है। पाकिस्तान ने डोनाल्ड ट्रंप के साथ क्रिप्टो करेंसी में इन्हीं दोनों के जरिए सौदा किया है। पर ईरान के सामने इन दोनों की चालाकी बुरी तरह से नाकाम हुई है। लिहाजा जेयर्ड कुशनर और स्वीट विटकॉफ पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है डोनाल्ड ट्रंप और उनके दूतों को समझना होगा कि युद्ध की मार से करीब करीब तबाह हो चुके तेहरान पर वो अपनी शर्तें नहीं थोप सकते हैं। ईरान के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। ईरान अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है जबकि अमेरिका अपनी दादागीरी दिखा रहा है। तेहरान के नये नेता की रणनीति अमेरिका के सामने डटे रहने की है, हिम्मत बनाए रखने की है क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ज्यादा दिनों तक जंग लड़ ही नहीं सकते हैं।

स्वीडन में लुंड यूनिवर्सिटी की ईरान विशेषज्ञ रूज़बेह पारसी ने एक लेख में लिखा है कि ‘ट्रंप की शांति योजना की ताजा कोशिश असल में ऐसी मांगों की एक लिस्ट है जो ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण के बराबर थीं।

इसके तहत तेहरान से न सिर्फ उसके परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को खत्म करने की मांग की गई, बल्कि उसके बैलिस्टिक मिसाइल जखीरे और क्षेत्रीय गठबंधनों के नेटवर्क को भी खत्म करने को कहा गया।

एक ऐसे देश के लिए जिसकी वायुसेना पुरानी पड़ चुकी है और जिसके सर्वोच्च नेता को अभी-अभी वॉशिंगटन के सहयोगी तेल अवीव ने मार गिराया है, उसके लिए बैलिस्टिक मिसाइलें ही पारंपरिक प्रतिरोध की आखिरी ढाल हैं।’

ईरान के साथ बातचीत की नाकामी के पीछे डोनाल्ड ट्रंप के दोनों दूत हैं। जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ। इन दोनों की सबसे बड़ी क्वालिटी ही ये है कि ये दोनों डोनाल्ड ट्रंप के करीबी हैं। कुशनर, डोनाल्ड ट्रंप के दामाद हैं और विटकॉफ करीबी दोस्त।

इन्हीं दोनों ने अमेरिका के भारत के साथ भी संबंध खराब किए हैं और इन्हीं दोनों को सीढ़ी बनाकर पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर भी ट्रंप से मिलने वाइट हाउस पहुंचे थे। लेकिन ईरान के सामने इनकी दाल नहीं गल रही है। इन दोनों के घमंड और इनकी अनुभवहीनता ने युद्ध को विनाशक मोड़ पर पहुंचा दिया है।

अमेरिका के पूर्व एनएसए जैक सुलिवन ने कहा कि अमेरिकी मध्यस्थों को ईरान की पेशकश समझ ही नहीं आई जबकि तेहरान ने शायद अभी तक का सबसे शानदार प्रस्ताव उनके सामने रखा था। रूज़बेह पारसी ने भी लिखा है कि इन दोनों की अनुभवहीनता का नतीजा यह हुआ है कि बातचीत करने वाली टीम को यही पूरी तरह समझ नहीं आता कि वे किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं।

ईरान को पता है कि उसे क्या चाहिए
ईरान के लिए सवाल अपने अस्तित्व को बनाए और बचाए रखने की है। उसे अच्छी तरह से पता है कि उसे क्या चाहिए। अस्तित्व बचाने के साथ उसकी कोशिश बातचीत के लिए एक ऐसी स्थिति का निर्माण करना है जहां उसे कोई भी ताकत चुनौती ना दे सके।

बैलिस्टिक मिसाइलों के मिडिल ईस्ट में हमले इसी रणनीति का हिस्सा है। उसकी रणनीति पानी की तरफ साफ है कि चाहे कुछ भी हो जाए, युद्ध के मैदान में डटे रहना है। हर वार पर पलटवार करना है।

वो किसी भी कीमत पर युद्ध लड़ रहा है और अपने से सैकड़ों गुना ज्यादा बड़ी शक्तियों के साथ जंग लड़ रहा है। ईरान अमेरिका को उस मोड़ पर खड़ा करना चाह रहा है जहां ट्रंप प्रशासन हाथ खड़ा कर दे कि वो लड़ने की स्थिति में नहीं है। ईरान उस स्थिति में अमेरिका को खड़ाकर बात करेगा।

जबकि इसके विपरीत डोनाल्ड ट्रंप हर दिन कई बार अपने लक्ष्य बदल रहे हैं। हर सोशल मीडिया पोस्ट और हर इंटरव्यू में वो अलग अलग बात बोल रहे हैं। कभी वो सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं तो कभी कहते हैं कि ईरान ने उन्हें सुप्रीम लीडर बनने का प्रस्तार दिया है।

फिर वो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के खत्म होने की घोषणा करते हैं और अगले ही ट्वीट में उन्हें ईरान में मौजूद 450 किलो संवर्द्धित यूरेनियन की याद आ जाती है। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि ईरान के खिलाफ जंग से बाहर कैसे निकलना है। वो खुद को विजेता बताते हैं लेकिन अंजाम दुनिया के सामने है।